Sunday, November 25, 2018

यात्रा जगन्नाथ पुरी की


जगन्नाथ मंदिर
जय जगन्नाथ !
आज मैं जगन्नाथ धाम पुरी की यात्रा का वृतान्त साझा कर रहा हूं। चार धामों में इस एक धाम का वर्णन करना आसान नहीं है, बस यहां आकर इसे अनुभव किया जा सकता है। यह स्थल जगन्नाथ यानि श्री कृष्ण को समर्पित है। यहां श्री कृष्ण अपने भाई बलराम व बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।
      स्टेशन से बाहर निकलते ही मन में भक्ति की लहर उठने लगती है। सबसे पहले मैनें एक आटो बूक किया तथा होटल गया। लगभग दो माह पहले ही मैनें एक होटल में रूम बूक कर रखा था। होटल ठीक समुद्र के तट पर ही स्थित था। होटल की संरचना भी कुछ ऐसी थी कि आप बालकनी से समुद्र के मनोरम दृष्य का आनंद ले सकें। होटल वालों से जानकारी मिली पूजा पाठ के लिहाज से अगर आप सुबह आठ- नौ बजे मंदिर पहुंचते हैं तो बेहतर होगा। सुबह आठ स्नान आदि कर होटल से बाहर निकल गया तथा एक आटो वाले ने मंदिर से लगभग 200 मीटर पहले उतार दिया। वाहनांे को मंदिर  के प्रवेश द्वार तक जाने की अनुमति नहीं है।
     जगन्नाथ मंदिर इतना भव्य है कि दूर से ही दृष्टिगोचर होने लगता है। इस मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र है, इस चक्र की विषेशता यह कि आप जहां कहीं से भी इस चक्र को देखेंगे आपको लगेगा यह आपकी तरफ ही मुड़ा है। शिखर पर लगा चक्र व पताका को देखते हुए हमलोग मंदिर की ओर चल दिए। प्रवेश मंडप पर साफ साफ कई निर्देश लगे हुए थे। वहीं समीप ही जूता स्टैंड था जहां हमलोगों ने अपने अपने जूता, चप्पल, बेल्ट, कैमरा, मोबाइल आदि जमा करा दिया। उसके बाद कतार में लग गए। हमलोगों से पहले भी कई लोग कतार में लगे हुए थे। धीरे धीरे कतार आगे बढ़ रही थी, अंततः हमलोगों का भी नंबर आया और हम प्रथम द्वार प्रवेश कर गए। आगे सिढ़ियां थी, बताया गया कि इसमे 22 सिढ़ियां हैं। यहां कुछ लोग फूल व फूलमाला बेच रहे थे। बेचने का तरीका ऐसा कि हर हाल में आपके हाथ में थमा कर ही दम लें। हलांकि मैनें नहीं लिया, क्योंकि मैं पहली बार यह मंदिर प्रवेश कर रहा था तथा इस बात से अनजान था कि फूल व फूलमाला जगन्नाथ प्रभु को समर्पित करने का मौका मिलेगा भी या नहीं। हलांकि बाद में इस बात का अहसास हो गया कि मेरा निर्णय सही था।
      प्रसाद खरीदा और दर्शन करने को आगे बढ़ा। यहां के पुजारी यानि पंडा मिल गये जो भगवान का दर्शन आराम से करवा देने का दावा कर रहे थे। मंदिर प्रवेश करते ही इस तरह के कई पंडा आपको मिलेेंगे बेहतर होगा। इन्हें पर ज्यादा ध्यान नहीं देना ही बेहतर है।  मन ही मन भगवान  जगन्नाथ का स्मरण करें। सबसे पहले प्रसाद खरीद लें। प्रसाद  के लिए सरकारी काउंटर बना हुआ है जहां सरकारी दर पर प्रसाद उपलब्ध है। अंदर गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा व बडे़ भाई  बलराम की प्रतिमा है। दर्शन के लिए अनियंत्रित भीड़ थी।  भीड़ देखकर ही मन में अजीब सा उहापोह था। प्रभु का स्मरण करते हुए आगे सरक रहा था। भगवान की अद्भुत कृपा थी कि इस भारी भीड़ में भी दर्शन हो गया। प्रतिमा दर्शन के दौरान मेरी मनः स्थिति क्या थी इसका वर्णन नहीं कर सकता। ऐसा लग रहा था मानो साक्षात भगवान आर्शीवाद बरसा रहे हो। हर्ष से गला रूंध गया था, आवाज नहीं निकल रही थी और आंखों से आंसू गए थे।  किसी बड़ी शक्ति की उपस्थिति का अहसास होने लगा था। यहां आकर प्रभु का स्मरण करते हुए यहां के अलौकिक वातावरण को महसूस करें।

दूर से दिखाई देता मंदिर  


     मुख्य मंदिर से बाहर निकलकर आंगन मे आ गया जहां छोटे छोटे मंदिरों का समूह था। अलग अलग देवताओं के क्रम से मंदिर थे। काफी देर तक मंदिरों की संरचना को निहारता रहा। इस मंदिर में चार मंडप है। पहला भोग मंडप - भोग लगाने के लिए, दूसरा रंग मंडप - भजन आदि के  लिए, तीसरा सभा मंडप- दर्शनार्थियों व भक्तों के लिए तथा एक जिसमें  प्रतिमाएं स्थापित हैं। ये सब जानकारी मैनंे वहां के जानकारों व पंडा से बातचीत के क्रम में बताया। उन्होंने जैसे बताया वैसे ही लिख रहा हूं। 
     पुरी का मुख्य आकर्शण जगन्नाथ मंदिर ही है। यहां का वार्शिक उत्सव रथयात्रा है जिसमें भाग लेने देश - विदेश से भारी संख्या में भक्तगण पहुंचते हैं। इस उत्सव में श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा की पूजा - अर्चना करते हैं।

नोट - चूंकि मंदिर में कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं थी इसलिए इस पोस्ट में लगी पहली तस्वीर मैनें गूगल सर्च से डाउनलोड किया है। 

No comments:

Post a Comment