Wednesday, November 14, 2018

छठ व्रतियों की मंजिल छठ घाट

 ‘कांच ही बांस के बंहगिया, बहंगी लचकत जाय ... ‘ जैसे छठ गीतों से गूंजता वातावरण, सर पर फलों व अन्य प्रसाद से सजा सूप, दौरा (डाला) लेकर नदी घाट की ओर तेजी से बढ़ती भक्तों की भीड़, साथ ही चल रहे निर्जला, अखंड उपवास कर भगवान भास्कर की आराधना में लीन व्रती। छठ घाट का माहौल पूरी तरह भक्तिमय। कुछ ऐसा ही नजारा मंगलवार यानि 13 नवंबर को देखने को मिला। क्या शहर, क्या गांव देश के विभिन्न जगहों से एक जैसी तस्वीर आ रही थी। तीर्थयात्रा के ब्लाग में ये पोस्ट इसलिए अपलोड कर रहा हूं कि क्योंकि जगह-जगह की नदियों व तालाबों का छठ घाट कुछ समय के लिए एक तीर्थस्थल का ही रूप ले लिया था। वहीं भक्त व व्रती की एकमात्र मंजिल छठघाट ही थी।

            मधुबन, गिरिडीह (झारखंड) में धूमधाम से मने छठ व्रत का विवरण दे रहा हूं। छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला अनुष्ठान है। इस पूजा की शुरूआत नहाय खाय के साथ शुरू होती है, दूसरे दिन खरना होता है यानि इसमें व्रती पूरे 24 घंटे का उपवास करते है, केवल शाम को पूजन के दौरान प्रसाद ग्रहण करती है। प्रसाद ग्रहण करने के दौरान भी कई नियमों का पालन किया जाता है। फिर दूसरे दिन से 24 घंटे का अखंड निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। यह व्रत काफी कठिन माना जाता है, इसमे छोटी सी छोटी चीजों पर खास कर पवि़त्रता पर काफी ध्यान रखा जाता है। यह व्रत सूर्य भगवान व उनकी पत्नी उषा को समर्पित है। इसी क्रम में मंगलवार 13.11.2018 को अस्ताचलगामी सूर्य व बुधवार 14.11.2018 को उदीयमान सूर्य को अघ्र्य दिया गया।
छठ घाट का नजारा 
  मंगलवार को दोपहर के तीन बज रहे हैं। वैसे लोग जो जिनका घर घाट से दूर है वे लोग प्रस्थान करने की तैयारी कर चूके हैं। महिलाएं छठ गीत गा रही हैं, आगे आगे डाला जा रहा है, डाला ले जा रहे लोगों के पीछे व्रती जा रहे हैं साथ में है भक्तों का जत्था। इधर भक्तों को किसी प्रकार की समस्या न हो इसके लिए सड़का को साफ सुथरा कर दिया गया है। जैसे समय बीतता जा रहा है, सड़क पर भक्तों का हुजूम भी बढ़ता जा रहा है। अब भगवान सूर्य अस्त होने को हैं, घाट पर भारी भीड़ उमड़ चुकी है। वहीं सभी व्रती पानी में उतर चुके हैं तथा भगवान भास्कर को अरघ्य दिया जा रहा है। अघ्र्य देने के बाद भक्तों का जत्था वापस अपने घरों की और लौटता है।
          बुधवार सुबह के तीन बज रहे हैं। घाट जाने की तैयारी शुरू होने लगी है। अब चार बज चुके हैं व्रती घाट की ओर निकल पड़े हैं। समय के साथ घाट में लोगों की भीड़ जमने लगी है। इधर पूरब में लाली फैलने लगी है यानि सूर्योदय का संकेत मिलने लगा है। 15 से 20 मिनट के दरम्यान में भगवान भास्कर अपने भक्तों को दर्शन दे सकते हैं। व्रती पानी में उतर चुके हैं, वे पानी में ही हाथ जोड़े  सूर्यदेव की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यूं ही समय बीतता है, सूर्य देव का उदय होते ही भक्तगण अघ्यै देने लगते हैं। हर कोई अघ्र्य देने को तत्पर है, कोई भी इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता है। एक दिन पूर्व जहां अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य प्रदान किया गया था वहीं दूसरे दिन उदीयमान सूर्य को अघ्र्य दिया गया। अघ्ये देने के बाद घर वापस गए एवं पारण किया। इस तरह उदीयमान सूर्य को अघ्र्य देने के साथ ही चार दिवसीय छठ पर्व संपन्न हो गया।
           इस पर्व की विषेशता यह कि इसमें न तो किसी पंडीत जी की जरूरत है, न मंत्रोच्चार की और न ही किसी मध्यस्थ की। भक्त सीधे अपने अराध्य को अघ्र्य देकर आराधना व पूजा करते हैं।

No comments:

Post a Comment