Sunday, November 25, 2018

यात्रा जगन्नाथ पुरी की


जगन्नाथ मंदिर
जय जगन्नाथ !
आज मैं जगन्नाथ धाम पुरी की यात्रा का वृतान्त साझा कर रहा हूं। चार धामों में इस एक धाम का वर्णन करना आसान नहीं है, बस यहां आकर इसे अनुभव किया जा सकता है। यह स्थल जगन्नाथ यानि श्री कृष्ण को समर्पित है। यहां श्री कृष्ण अपने भाई बलराम व बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।
      स्टेशन से बाहर निकलते ही मन में भक्ति की लहर उठने लगती है। सबसे पहले मैनें एक आटो बूक किया तथा होटल गया। लगभग दो माह पहले ही मैनें एक होटल में रूम बूक कर रखा था। होटल ठीक समुद्र के तट पर ही स्थित था। होटल की संरचना भी कुछ ऐसी थी कि आप बालकनी से समुद्र के मनोरम दृष्य का आनंद ले सकें। होटल वालों से जानकारी मिली पूजा पाठ के लिहाज से अगर आप सुबह आठ- नौ बजे मंदिर पहुंचते हैं तो बेहतर होगा। सुबह आठ स्नान आदि कर होटल से बाहर निकल गया तथा एक आटो वाले ने मंदिर से लगभग 200 मीटर पहले उतार दिया। वाहनांे को मंदिर  के प्रवेश द्वार तक जाने की अनुमति नहीं है।
     जगन्नाथ मंदिर इतना भव्य है कि दूर से ही दृष्टिगोचर होने लगता है। इस मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र है, इस चक्र की विषेशता यह कि आप जहां कहीं से भी इस चक्र को देखेंगे आपको लगेगा यह आपकी तरफ ही मुड़ा है। शिखर पर लगा चक्र व पताका को देखते हुए हमलोग मंदिर की ओर चल दिए। प्रवेश मंडप पर साफ साफ कई निर्देश लगे हुए थे। वहीं समीप ही जूता स्टैंड था जहां हमलोगों ने अपने अपने जूता, चप्पल, बेल्ट, कैमरा, मोबाइल आदि जमा करा दिया। उसके बाद कतार में लग गए। हमलोगों से पहले भी कई लोग कतार में लगे हुए थे। धीरे धीरे कतार आगे बढ़ रही थी, अंततः हमलोगों का भी नंबर आया और हम प्रथम द्वार प्रवेश कर गए। आगे सिढ़ियां थी, बताया गया कि इसमे 22 सिढ़ियां हैं। यहां कुछ लोग फूल व फूलमाला बेच रहे थे। बेचने का तरीका ऐसा कि हर हाल में आपके हाथ में थमा कर ही दम लें। हलांकि मैनें नहीं लिया, क्योंकि मैं पहली बार यह मंदिर प्रवेश कर रहा था तथा इस बात से अनजान था कि फूल व फूलमाला जगन्नाथ प्रभु को समर्पित करने का मौका मिलेगा भी या नहीं। हलांकि बाद में इस बात का अहसास हो गया कि मेरा निर्णय सही था।
      प्रसाद खरीदा और दर्शन करने को आगे बढ़ा। यहां के पुजारी यानि पंडा मिल गये जो भगवान का दर्शन आराम से करवा देने का दावा कर रहे थे। मंदिर प्रवेश करते ही इस तरह के कई पंडा आपको मिलेेंगे बेहतर होगा। इन्हें पर ज्यादा ध्यान नहीं देना ही बेहतर है।  मन ही मन भगवान  जगन्नाथ का स्मरण करें। सबसे पहले प्रसाद खरीद लें। प्रसाद  के लिए सरकारी काउंटर बना हुआ है जहां सरकारी दर पर प्रसाद उपलब्ध है। अंदर गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा व बडे़ भाई  बलराम की प्रतिमा है। दर्शन के लिए अनियंत्रित भीड़ थी।  भीड़ देखकर ही मन में अजीब सा उहापोह था। प्रभु का स्मरण करते हुए आगे सरक रहा था। भगवान की अद्भुत कृपा थी कि इस भारी भीड़ में भी दर्शन हो गया। प्रतिमा दर्शन के दौरान मेरी मनः स्थिति क्या थी इसका वर्णन नहीं कर सकता। ऐसा लग रहा था मानो साक्षात भगवान आर्शीवाद बरसा रहे हो। हर्ष से गला रूंध गया था, आवाज नहीं निकल रही थी और आंखों से आंसू गए थे।  किसी बड़ी शक्ति की उपस्थिति का अहसास होने लगा था। यहां आकर प्रभु का स्मरण करते हुए यहां के अलौकिक वातावरण को महसूस करें।

दूर से दिखाई देता मंदिर  


     मुख्य मंदिर से बाहर निकलकर आंगन मे आ गया जहां छोटे छोटे मंदिरों का समूह था। अलग अलग देवताओं के क्रम से मंदिर थे। काफी देर तक मंदिरों की संरचना को निहारता रहा। इस मंदिर में चार मंडप है। पहला भोग मंडप - भोग लगाने के लिए, दूसरा रंग मंडप - भजन आदि के  लिए, तीसरा सभा मंडप- दर्शनार्थियों व भक्तों के लिए तथा एक जिसमें  प्रतिमाएं स्थापित हैं। ये सब जानकारी मैनंे वहां के जानकारों व पंडा से बातचीत के क्रम में बताया। उन्होंने जैसे बताया वैसे ही लिख रहा हूं। 
     पुरी का मुख्य आकर्शण जगन्नाथ मंदिर ही है। यहां का वार्शिक उत्सव रथयात्रा है जिसमें भाग लेने देश - विदेश से भारी संख्या में भक्तगण पहुंचते हैं। इस उत्सव में श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा की पूजा - अर्चना करते हैं।

नोट - चूंकि मंदिर में कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं थी इसलिए इस पोस्ट में लगी पहली तस्वीर मैनें गूगल सर्च से डाउनलोड किया है। 

Friday, November 16, 2018

भुवनेश्वर - पुरी : छोटी यात्रा का यादगार अनुभव

 म तौर पर ट्रेन सफर का अनुभव उस समय काफी यादगार होता है जब आप कोई प्रसिद्ध  स्थल जा रहे हैं। रेल यात्रा में कई सहूलियत भी मिलती है यही वजह है कि बस, टैक्सी आदि की सुविधा उपलब्ध रहने के बावजूद मैनें भुवनेश्वर से पुरी जाने के लिए ट्रेन का ही चयन किया। नयी जगह होने के कारण पहले से ही नंदन कानन
एक्सप्रेस में रिजर्वेसन करा लिया था। हलांकि एक दिन पूर्व ही रेलवे के एक एप्पलीकेशन से यह जानकारी मिली गयी थी कि जिस गाड़ी में रिजर्वेसन था वह छह घंटे लेट है। बाद में उसी एप्पलीकेशन से इंटरसिटि एक्सप्रेस में सीट बुकिंग कियंा।
          तय समय यानि सुबह के दस बजे हमलोग भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन पहुंच चुके थे। आम तौर जैसे स्टेशनों का माहौल रहता है ठीक वैस ही माहौल था। आने जाने वाली गाड़ियों की घोषणा हो रही थी। भागमभाग वाला माहौल आपको इस बात की याद दिलाते रहता है कि आप यात्रा पर हैं।ज्यादा भीड़, घक्कामुक्की या कोई अन्य परेशानी हो तो एडजस्ट करें और यात्रा का आनंद लें। नयी जगह पर नये लोग मिलते हैं तो बहुत कुछ जानने समझने को मिलता है। जिस गाड़ी में हमारा रिजवर्सेन था वह छह घंटे लेट थी, पर दूसरी गाड़ी भी लेट थी। लगभग दो घंटे की प्रतीक्षा के बाद प्लेटफार्म पर इंटरसिटि एक्सप्रेस आयी। गाड़ी लगभग खाली थी, मैं जिस बोगी पर सवार हुआ उसमें दो- चार लोग ही हुए बैठे थे। पांच मिनट बाद गाड़ी अपने गंतव्य की ओर सरकने लगी।

यात्रा का आनंद लेते बच्चे


 ट्रेन की खिड़की से शहर का वह हिस्सा भी देख पाया जो देख नहीं सका था। खाली गाड़ी में आराम से बैठकर बाहर का नजारा देखना आनंददायक होता है। लगभग एक घंटे बाद  गाड़ी खुर्धा रोड पहुंची। कुछ लोग जो थे वे भी उतर गए। फिर से गाड़ी आगे की ओर सरकने लगी, रफतार से खेतों से गुजरते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ती जा रही थी।
         लगभग आधे घंटे बाद पुरी स्टेशन में प्रवेश कर गयी। समुद्र देखने का काफी उत्साह था, शायद खिड़की से दिख जाय। भले ही न दिखे पर हमलोग अपनी मंजिल पर आ चुके थे  और अब चंद मिनटों मे समुद्र दर्शन करने वले थे। गाड़ी से उतरते ही कई आटो वालो ने पूछना शुरू कर दिया। मेरी राय है कि पहले आप स्टेशन से बाहर निकल जायें, सामने ही आटो स्टैंड है। एक- दो आटो वाले से किराया पूछ कर वाजिब किराया तय कर लें।



 भुवनेश्वर से पुरी की यात्रा का समय बहुत ही कम (लगभग डेढ़ घंटा) था पर यात्रा का अनुभव उत्कृष्ट था। आगे मैं पुरी व जगन्नाथ धाम से संबंधित दो अलग- अलग पोस्ट साझा करूंगा। 

Wednesday, November 14, 2018

छठ व्रतियों की मंजिल छठ घाट

 ‘कांच ही बांस के बंहगिया, बहंगी लचकत जाय ... ‘ जैसे छठ गीतों से गूंजता वातावरण, सर पर फलों व अन्य प्रसाद से सजा सूप, दौरा (डाला) लेकर नदी घाट की ओर तेजी से बढ़ती भक्तों की भीड़, साथ ही चल रहे निर्जला, अखंड उपवास कर भगवान भास्कर की आराधना में लीन व्रती। छठ घाट का माहौल पूरी तरह भक्तिमय। कुछ ऐसा ही नजारा मंगलवार यानि 13 नवंबर को देखने को मिला। क्या शहर, क्या गांव देश के विभिन्न जगहों से एक जैसी तस्वीर आ रही थी। तीर्थयात्रा के ब्लाग में ये पोस्ट इसलिए अपलोड कर रहा हूं कि क्योंकि जगह-जगह की नदियों व तालाबों का छठ घाट कुछ समय के लिए एक तीर्थस्थल का ही रूप ले लिया था। वहीं भक्त व व्रती की एकमात्र मंजिल छठघाट ही थी।

            मधुबन, गिरिडीह (झारखंड) में धूमधाम से मने छठ व्रत का विवरण दे रहा हूं। छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला अनुष्ठान है। इस पूजा की शुरूआत नहाय खाय के साथ शुरू होती है, दूसरे दिन खरना होता है यानि इसमें व्रती पूरे 24 घंटे का उपवास करते है, केवल शाम को पूजन के दौरान प्रसाद ग्रहण करती है। प्रसाद ग्रहण करने के दौरान भी कई नियमों का पालन किया जाता है। फिर दूसरे दिन से 24 घंटे का अखंड निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। यह व्रत काफी कठिन माना जाता है, इसमे छोटी सी छोटी चीजों पर खास कर पवि़त्रता पर काफी ध्यान रखा जाता है। यह व्रत सूर्य भगवान व उनकी पत्नी उषा को समर्पित है। इसी क्रम में मंगलवार 13.11.2018 को अस्ताचलगामी सूर्य व बुधवार 14.11.2018 को उदीयमान सूर्य को अघ्र्य दिया गया।
छठ घाट का नजारा 
  मंगलवार को दोपहर के तीन बज रहे हैं। वैसे लोग जो जिनका घर घाट से दूर है वे लोग प्रस्थान करने की तैयारी कर चूके हैं। महिलाएं छठ गीत गा रही हैं, आगे आगे डाला जा रहा है, डाला ले जा रहे लोगों के पीछे व्रती जा रहे हैं साथ में है भक्तों का जत्था। इधर भक्तों को किसी प्रकार की समस्या न हो इसके लिए सड़का को साफ सुथरा कर दिया गया है। जैसे समय बीतता जा रहा है, सड़क पर भक्तों का हुजूम भी बढ़ता जा रहा है। अब भगवान सूर्य अस्त होने को हैं, घाट पर भारी भीड़ उमड़ चुकी है। वहीं सभी व्रती पानी में उतर चुके हैं तथा भगवान भास्कर को अरघ्य दिया जा रहा है। अघ्र्य देने के बाद भक्तों का जत्था वापस अपने घरों की और लौटता है।
          बुधवार सुबह के तीन बज रहे हैं। घाट जाने की तैयारी शुरू होने लगी है। अब चार बज चुके हैं व्रती घाट की ओर निकल पड़े हैं। समय के साथ घाट में लोगों की भीड़ जमने लगी है। इधर पूरब में लाली फैलने लगी है यानि सूर्योदय का संकेत मिलने लगा है। 15 से 20 मिनट के दरम्यान में भगवान भास्कर अपने भक्तों को दर्शन दे सकते हैं। व्रती पानी में उतर चुके हैं, वे पानी में ही हाथ जोड़े  सूर्यदेव की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यूं ही समय बीतता है, सूर्य देव का उदय होते ही भक्तगण अघ्यै देने लगते हैं। हर कोई अघ्र्य देने को तत्पर है, कोई भी इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता है। एक दिन पूर्व जहां अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य प्रदान किया गया था वहीं दूसरे दिन उदीयमान सूर्य को अघ्र्य दिया गया। अघ्ये देने के बाद घर वापस गए एवं पारण किया। इस तरह उदीयमान सूर्य को अघ्र्य देने के साथ ही चार दिवसीय छठ पर्व संपन्न हो गया।
           इस पर्व की विषेशता यह कि इसमें न तो किसी पंडीत जी की जरूरत है, न मंत्रोच्चार की और न ही किसी मध्यस्थ की। भक्त सीधे अपने अराध्य को अघ्र्य देकर आराधना व पूजा करते हैं।

Sunday, November 11, 2018

बहुसांस्कृतिक शहर है भुवनेश्वर

म्ंदिरों का नगर भुवनेश्वर, एक ऐसी जगह जहां आप न केवल प्राचीन मंदिरों से रूबरू होते हैं बल्कि उस शहर से आपका पचिय होता है जो लंबे अरसे से सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजे हुए हैं। यहां एक से बढ़कर एक स्थापत्य नमूने हैं। आप भले ही शहर घूमते हुए शारिरिक रूप से थक जाएं पर मन यहां का हर कोना झांकना चाहेगा। और हो भी क्यों न, प्राचीन शिल्प कला, मंदिरों की भव्यता व शुचिता, खान-पान, सबकुछ अनूठा व रोचक है। यह एक बहुसांस्कृतिक शहर है। एक से बढ़कर एक मंदिर जिसे देखते ही इसे हमेशा अपनी आंखें में सहेज लेने की तीव्र इच्छा होती है, शायद इसलिए इसे मंदिरों के नगर की संज्ञा दी गयी है। मैंने भी इस शहर के बारे में बहुत कुछ पढ़ा व सुना था यही वजह है कि मेरी जिज्ञासा भी चरम पर थी।
         रांची स्थित स्थित बिरसा मुंडा हवाई अड्डा से सुबह भुवनेश्वर के लिए हमारी फलाइट थी। भुवनेश्वर घुमने की इच्छा संजोए हमलोग तय समय पर एयरपोर्ट पहुचंे तथा चेकइन की सारी औपचारिकताएं पूरी की। फलाइट भी समय पर थी लिहाजा सुबह 10ः05 में हम बिजु पटनायक अतराश्ट्रीय एयरपोर्ट पर लैंड कर गए।
भुवनेश्वर एयरपोर्ट पर पत्नी व बच्चे


बाहर निकलते ही यहां का वातावरण स्पष्ट रूप से संकेत देने लगा कि हम मंदिरों के नगर में आ चुके हैं। हमलोगों की तरह वैसे भी कई यात्री थे जो इस शहर की सुंदरता व विषेशताओं को निहारने पहुंचे थे। मैनें इस ब्लाग पर भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर तथा नंदन कानन चिड़ियाघर का विवरण दिया है। ‘नंदन कानन: जहां प्रकृति व पशु, पक्षियों से होता है साक्षात्कार‘, ‘लिंगराज मंदिर: कलिंग शैली का सर्वश्रेश्ठ स्थापत्य‘ शीर्षक से पोस्ट पढ़ सकते हैं।
   


होटल का कमरा
   महज 22-24 घंटे बीताकर आप एक शहर की नब्ज बहुत अच्छी तरह से तो टटोल नहीं सकते। उसमें से कुछ घंटे तो केवल एयरपोर्ट, स्टेशन व होटल के बीच चक्कर काटने में बीत जाते हैं। यहां मेरे पास समय की कमी थी पर जिस होटल में मैं ठहरा था ठीक उसी के प्रवेश द्वार पर एक आटो वाला मिला। उसने कहा कि वह यहां के सभी मंदिरों व अन्य दर्शनीय स्थल मसलन म्यूजीयम आदि का क्रम से दर्शन करा देगा। फिर क्या था तुरंत ही योजना बनी और शुरू हो गयी हमारी मंदिर दर्शन यात्रा।
          सबसे पहले हमलोग लिंगराज मंदिर पहुंचे । लिंगराज मंदिर परिसर के अंदर एक मंदिरों का समूह है। इसके अलावा इसके आसपास कई प्रसिद्ध मंदिर है। यहां पर एक संग्रहालय भी है जो दर्शनीय है। पर याद रखें यह सोमवार को बंद रहता है।
म्यूजीयम

बात भुवनेश्वर की करें और यहां के खान पान का जिक्र न हो तो यह इस शहर के लिए अन्याय होगा। यहां का भोजन काफी स्वादिष्ट होता है नारियल तेल से पके व्यंजन का स्वाद जल्द भूला नहीं पाऐंगे। और अगर आप ननवेज पसंद करते हैं तो मछली का स्वाद भी आपको आकर्षित करेगा। तटीय क्षेत्र होने के कारण यहां ताजी मछलियां मिलती है जिसे लोग बड़े चाव से खाते हैं। यही नहीं आलू दम दही बड़ा, इडली, डोसा, पू़डी सब्जी आदि भी काफी स्वादिश्ट थे। वाकई में स्वाद की समझ भी इस स्मार्ट सिटि की बेहतरीन है।

Friday, November 9, 2018

नंदन कानन : जहां प्रकृति व पशु, पक्षियों से होता है साक्षात्कार


न्ंदन कानन जैविक उद्यान, ऐसी जगह जिसका नाम लेते ही जेहन में लगभग दो घंटे की वो यादें कुलाचें मारने लगती है जो कुछ दिन पहले यहां घूमने के दौरान बीताया था। उद्यान में बीताए गए वे कुछ अविस्मरणीय ऐसे पल थे कि चर्चा करते ही वहां से घूुम कर आये बच्चे भी वहां का वर्णन करने को मचल उठते है। शोर-शराबे से दूर बसी एक अलग ही दुनिया जहां न केवल आप शांत वातारण का आनंद लेते हैं बल्कि यहां जंगली जानवरों व पक्षियों का साक्षात्कार भी होता है। उड़िसा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित यह चिड़ियाघर प्रकृति प्रेमियों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। 



हमलोग सुबह नौ बजे प्रवेश द्वार के सामने पहुंच चुके थे। यहां पर कई दुकाने लगी हैं जहां आप नाश्ता या खानां का लुत्फ उठा सकते हैं। हमारे साथ बच्चे भी थे। टिकट लेने के बाद हमें अंदर जानें की अनुमति मिली। सुरक्षा जाचं के बाद  अंदर जाने दिया गया। यहां प्लास्टिक ले जाने की अनुमति नहीं है, अगर आपके पास प्लास्टिक है तो बाहर ही छोड़ दें। अंदर घुसते ही हमें एक बड़ा पानी का फव्वारा दिखा मानो वह स्वागत के लिए खड़ा हो, निरंतर एक ही लय में चालू रहता है।
यहां से शुरू होती है आपकी यह उद्यान यात्रा। यहां आपको कई गाइड मिलेंगे जिन्हें बूक करने पर वे आपको पूरा चिड़ियाघर दिखाऐंगे तथा हर एक चीज के बारे में बताऐंगे। हलांकि इसके एवज में कुछ शुल्क लेंगे। हमलोगों ने कोई गाइड नहीं लिया। वैसे भी अगर आप यहां आकर आनंद उठाना चाहते हैं तो हाथ में पूरा समय लेकर आयें तथा इत्मीनान से पैदल घूमते हर एक नजारा का आनंद लें। हर जानवर या पक्षी के बाड़े के सामने बड़े - बड़े बोर्ड पर विवरण लिखा हुआ है जिससे आपको पूरी जानकारी मिल जाएगी। किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं है। गाइड आपको जल्दी जल्दी चलने का दबाव बनाऐंगे ताकि जल्द ही वह एक ओर नये यात्री को घूमा सके। वैसे लोग जो पैदल चलने में असमर्थ हैं या फिर चलना नहीं चाहते हैं, बैटरी गाड़ी बूक कर भी इस पार्क का आनंद ले सकते हैं।

भालू, शेर, हाथी तेंदुआ और न जानें क्या क्या। जानवरों की इतनी संख्या की बाहर आते आते कुछ आपके दिमाग से हट जाते हैं तो कुछ अपनी विषेशताआं से दिमाग में घर कर जाते हैं। खास कर शेर, चीता, हिरण आदि को स्वतंत्र रूप से भ्रमण करते देखना बच्चों के लिए काफी मनोरंजक होता है। यही नहीं किस्म-किस्म के पक्षियों का कलरव सुनना व उन्हें नजदीक से देखना एक सुखद अहसास होता है। किसी पक्षी को आप जानते हैं तो किसी को देख यह अंदाज लगाते हैं कि शायद इसका नाम यह होगा। इससे पहले मैंने मोर के नृत्य के बारे में केवल सुना था पर मोर नाचते देखना कितना मनोहारी होता है इसका अनुभव यहीं आकर मिला।

बोटिंग यहां के विशेष आकर्षणों में से एक है। एक बड़े तालाब में बोटिंग करने का एक अलग मजा है। आप चाहे तो इंजन वाली बोट का चयन कर सकते हैं या फिर पैडल वाली बोट। हलांकि सुरक्षा के दृष्टिकोण से बच्चों को पैडल वाली बोट में बैठने की अनुमति नहीं है। अगर साथ में बच्चे हैं तो इंजनवाली बोट ले लें जिसका चालक तालाब का सैर करायगा। आप केवल आनंद लेते रहें।



 यहां एक रेपटाइल पार्क भी हैं जहां तरह तरह के सरीसृप देखने को मिलेंगे। बात चाहे विभिन्न प्रकार के संाप की हो या फिर मगरमच्छ की इनसभी से संबंधित तमाम तरह की जिज्ञासाएं समाप्त हो जाएगी। इसके अलावा टाइगर सफारी, लायन सफारी, बियर सफारी आदि  विशेष आकर्षण है। कुल मिलाकर यह चिड़ियाघर कई मामले में अद्वितीय है जैसे सफेद बाघ का होना आदि।

कब जाएं 

हर सोमवार को यह पार्क बंद रहता है। वहीं अप्रेल माह से सितंबर माह के बीच 7ः30 बजे सुबह से 5ः30 बजे शाम तक तथा अक्टूबर माह से मार्च माह तक सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक खुला रहता है।

कैसे पहुंचें 

भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन से इस पार्क की दूरी 15 किलोमीटर है। भुवनेश्वर स्टेशन देश के सभी प्रमुख स्टेशनों से जुड़ा हुआ है। स्टेशन से पार्क के लिए आटो व कैब हर समय उपलब्ध रहता है।
बिजु पटनायक अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट से नंदन कानन जैविक उद्यान की दूरी 20 किलोमीटर है।