Saturday, October 27, 2018

लिंगराज मंदिर : कलिंग शैली का सर्वश्रेष्ठ स्थापत्य


यूं तो भारत में ऐसे मंदिरों की लंबी सूची हैं जहां की भव्यता व सुंदरता वर्णन से परे हैं। यह लेख उस जगह के बारे में है जहां पहुंचते ही न केवल आपके मन में श्रद्धा, भक्ति व अध्यात्म की लहर उमड़ने लगती है बल्कि आप एक अनुपम कृति का साक्षात्कार भी करते हैं। जी हां, मैं बात कर रहा हूं उड़िसा राज्य स्थित सुप्रसिद्ध लिंगराज मंदिर की। उड़ीस की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित यह मंदिर स्थापत्यकला का अनुपम उदाहरण है। मंदिर की बनावट, निर्माण प्रणाली, सुक्ष्म से सुक्ष्म कारीगरी, मंदिर परिसर का भक्तिमय माहौल आपको अश्चर्यचकित कर देगा। यकीन मानिए यहां पहुंचते ही आप कुछ देर के लिए सब कुछ भूल जाऐंगे।
           सुबह दस बजकर पांच मिनट में हमारी लैंडिंग बिजु पटनायक अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट, भुवनेश्वर में हुई। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही इस बात का अहसास होने लगा था कि हमलोग अब मंदिरों के नगर में हैं। हमारी जिज्ञासा को कैब ड्राइवर व होटल ( जिस होटल में ठहरे थे) के प्रबंधक ने कुछ शांत किया। शाम को हमलोग बाहर निकले तथा भुवनेश्वर आने का ध्येय एक आटो वाले को बताया। उसने सलाह दी कि कुछ ही दूरी पर लिंगराज मंदिर है और हमे उस मंदिर का दर्शन अवश्य कर लेना चाहिए। ठीक पांच मिनट के बाद हमलोग एक विशाल व भव्य मंदिर के सामने खड़े थें।
             मंदिर के ठीक सामने वाहन स्टैंड था जिसमें कई तरह की गाड़ियां कतारबद्ध खड़ी थी। शाम होने के कारण तीर्थयात्रियों व स्थानीय लोगों की चहलकदमी तेज हो गयी थी। मंदिर प्रवेश द्वार के समीप कई ऐसे बोर्ड थे जो स्पष्ट संकेत दे रहे थे कि आप मंदिर के अंदर मोबाइल, कैमरा व अन्य निषेध सामग्री नहीं ले जा सकते हैं, कई काउंटर बने हैं जहां आप अपना सामान जमा कर सकते हैं मंदिर से बाहर निकलने के बाद फिर आप लें ले। सभी समान जमा कराने के बाद अब हमलोग मंदिर प्रवेश के लिए पूरी तरह तैयार थे। सुरक्षा के दृष्टिकोण से पुलिस बल तैनात थे तथा श्रद्धालुओं की जांच भी की जा रही थी।
           सीढ़ी उतरते ही जैसे ही आप मंदिर प्रांगण में पहुंचते हैं एक अदभुत वातावरण का अहसास होने लगता है। ठीक बगल में नल लगे हुए हैं जहां प्रवेश के पहले शुद्धीकरण के लिए आप अपना हाथ पैर धो सकते हैं। सामने ही एक भव्य मंदिर तथा ठीक उसके अगल-बगल दर्जनाधिक मंदिर है यानि मंदिरों का एक समूह है। इसके अलावा एक वृषभ यानि नंदी महाराज की मूर्ति भी प्रतिष्ठित है। सभी प्राचीन मंदिर हैं पर दिव्यता आज भी वैसे ही बरकरार है।
           मूल मंदिर में प्रवेश करते ही एक भक्तिमय माहौल का अहसास होता है। हमलोग जब अंदर गए उस भारी संख्या में भक्तगण बाबा लिंगराज का आरती दर्शन कर रहे थे। हमें बाबा का दर्शन करने, आरती लेने व प्रसाद लेने का अवसर मिला। उसके बाद हमने क्रम से गणेश भगवान, वैद्यनाथ भगवान, सोमनाथ आदि का दर्शन किया। यहां इतनी प्रतिमा व मंदिर है जिनकी सूची बनाना असान नहीं है और उस सूची को एक ब्लाग के पोस्ट में समाहित नहीं किया जा सकता है।

कब बना था यह मंदिर 

मंदिर परिसर में जानकारों व वहां के पुजारियों से बातचीत के क्रम में पता चला कि यह मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पहले राजा ययाति केषरी, अनन्त केशरी और ललातेन्दु केशरी इन तीन राजाओं के शासन के समय पर निर्मित हुआ था। इसका शिखर आमलक पत्थर से आच्छादित है तथा शिखर के उपर एक कलश भी स्थापित किया गया है। आगे बता दूं कि इस मंदिर को 1. श्री मंदिर 2. जगमोहन 3. नाटमंडप व 4. भोगमंडप में बांटा गया है। मंदिर देखते ही दिमाग में कई तरह के सवाल उमडने लगेंगे कि आखिर एक हजार साल पहले इतना भव्य मंदिर का निर्माण कैसे संभव हो सका।

सालोभर चलता रहता है उत्सव का सिलसिला   

यहां पूरे वर्ष कई तरह के उत्सव का आयोजन किया जाता है जैसे प्रवरण (मार्गशिर्ष महीना), पुष्याभिषेक (पौष महीना), मकर संक्रांति (माघ महीना) आदि। यहां भी रथयात्रा निकाली जाती है और यह रथयात्रा अषोकाष्टमी रथयात्रा के नाम से जाना जाता है। वहीं यह रथयात्रा हर वर्ष चैत्र माह शुक्ल अष्टमी के दिन आयोजित होती है। इसके अलावा शिव विवाह भी यहां का प्रसिद्ध उत्सव है। शिव विवाह ज्येष्ठ माह में मनाया जाता है।
         चूंकि मंदिर के अंदर कैमरा ले जाना प्रतिबंधित था इसलिए मैं यहां किसी भी तरह की तस्वीर नहीं ले सका। अतः इस लेख के लिए प्रतिकात्मक फोटो मैनें गूगल सर्च से डाउनलोड कर प्रकाशित किया है।

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