Wednesday, October 24, 2018

ऐसे करें पारसनाथ पर्वत की परिक्रमा


पारसनाथ पर्वत

पारसनाथ पर्वत जैनियों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। भक्तगण पर्वत स्थित मंदिरों व टोंकों में जाकर पूजोपासना करते हैं। पर यहां पूरे पर्वत की परिक्रमा करने की भी परंपरा है। समय- समय पर भक्तों का जत्था पर्वत की परिक्रमा करने को ले निकलता है। चूंकि परिक्रमा करना थोड़ा मुश्किल होता है तथा अधिकांश रास्ता जंगलों से होकर गुजरता है इसलिए ज्यादा संख्या में ही यात्रा पर निकलना बेहतर होता है। इस लेख में परिक्रमा से संबंधित पूरी यात्रा का वृतांत साझा कर रहा हूं। 

         वृतांत शुरू करूं इससे पहले आपको परिक्रमा के महत्व को बता दूं। परिक्रमा के महत्व पर हरेक व्यक्ति विशेष की अपनी अपनी राय है।पर समान्य सी बात यह है कि इस पर्वत से 20 तीर्थंकरों के अलावा असंख्य मुनियों ने निर्वाण प्राप्त किया है। उनकी चैतन्य विद्युत धारा से यह पर्वत माहशक्ति बन गया है। जब लघु शक्तिधारी जीव इस महाशक्तिधारी पर्वत की परिक्रमा करता है तब जीव एवं महाशक्ति भावात्मक धागे से आपस में जुड़ जाते हैं। इसी स्थिति में जीव के अंदर शक्ति का संचार होने लगता है। जीव की आत्मा विकसित होने लगती है यानि सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् चरित्र का संस्कार आने लगता है। इसके अलावा भी शास्त्रों में विद्वानों ने अपने अपने मत दिए हैं। खैर, मैं आपको परिक्रमा का अनुभव बता रहा हूं।

                 साधुओं की एक टोली परिक्रमा के लिए निकल रही थी साथ में दर्जनाधिक भक्त भी शामिल थे। मै भी उन्हीं के साथ यात्रा में शामिल हो गया। हलांकि यात्रा शुरू होने के पहले मन में एक अजीब सा द्वंद चल रहा था। अव्वल बात तो यह कि 48 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी थी, दूसरी पूरा का पूरा रास्ता उबड़- खाबड़, पथरीला व जंगली था। सुबह पांच बजे पूरा जत्था जयकारा लगाते हुए यात्रा के लिए निकला। मैंने भी पूरे विश्वास के साथ आगे की और कदम बढ़ाया। सूर्य की किरणों ने अब तक धरती का स्पर्श नहीं किया था और हमलोगों पूर्व दिशा की ओर ही आगे बढ़ रहे थे। लगभग तीस मीनट के बाद सीतनाला मिला जहां स्वच्छ व निर्मल जलधारा बह रही थी। कुछ लोगों ने हाथ, पैर धोए, कल -कल करती हुई जलधारा व कोलाहल से दूर शांत वातावरण का ही प्रभाव था कि अनायास ही कदम आगे बढ़ने लगे।

पहाड़ी नाला

आगे बढ़ते हुए हमलोग बेलाटांड़ गांव के समीप पहुंच गए। यहां से भी पर्वत स्थित चं्रदप्रभु टोंक व पार्श्वनाथ टोंक स्पष्ट दिख रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उस महाशक्ति से जुड़े हुए हों। हमलोग आगे बढ़ते गए और क्रम से बाराडीह गांव, बारीटांड़ गांव, चर्च व स्कूल, बोकराडीह गांव, चतरोबेड़ा गांव आदि मिलते गए। यह सब ऐसी जगह थी जिसका सही सही वर्णन कर पाना बहुत मुश्किल है। यूं कहें शब्दों से बयां कर पाना असंभव सा लगता है मानो सीधे सीधे प्रकृति की सुंदरता से साक्षात्कार कर रहे हैं। बीच बीच में मशक्कत भरी यात्रा मिलती है पर जैसे ही आपकी नजर सूर्य की सीधी किरणों से चमकते पार्श्वनाथ व चंद्रप्रभु की टोंक, कुछ ही पल बाद पर्वत की चोटियों से अठखेलियां करती बादल की टुकड़िया, पवन के झांको से झुमती लताओं जैसे नयनाभिराम दृष्यों पर पड़ती है आप कुछ देर के लिए खो जाते हैं।

 जंगली पुष्प वृक्ष
कभी कभी कठीन डगर कब समाप्त हो जाता है आपको इसका अंदाजा भी नहीं मिलता। जंगल का एक भाग समाप्त होने के बाद आप एक बार फिर कोलाहल से भी दुनिया में प्रवेश कर जाते है। घड़ी में साढ़े दस बज रहे थे और हमलोग अब जीटी रोड के किनारे किनारे चल रहे थे। बता दें जीटी रोड दिल्ली से कोलकाता को जोड़ती है, पूर्व दिशा की ओर कोलकाता है। कुछ दूर चलने के बाद हमलोग निमियाघाट जैन मंदिर पहुंचे जहां भक्तों ने विश्राम किया। हलांकि अब तक हमलोग कई जगह रूक कर आराम कर चुके थे पर यहां विश्राम की अवधि कुछ लंबी थी।

एक और जंगली पुष्प वृक्ष

 निमयाघाट दिगंबर जैन मंदिर का पूरा विवरण हमने इस ब्लाग के लेख में दिया है। मंदिर मेंं जानने के लिए कृप्या गिरिडीह जिला के जैन दर्शनीय स्थल जरूर पढ़ें। अब तक हमलोगों ने लगभग 35 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर ली थी। वैसे लोग जो एक दिन में पूरी यात्रा नहीं कर पाते हैं वे यहां रात्रि विश्राम करते हैं तथा दूसरे दिन प्रातः काल शेष यात्रा पूरी करते हैं। खासकर साधु वर्ग पूजा, साधना के लिए रूकते है। लगभग दो बजे पुनः हमलोग की यात्रा एक अंतराल के बाद शुरू हो गयी और कुछ देर में हमलोग फिर एक बार पुरी तरह प्रकृति की गोद में थे। यहां की खूबसूरत वादियां अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। कभी रास्ता हिम्मत और धेर्य की परीक्षा लेने लगता था तो कभी सहज व सरल लगने लगता। घने जंगलों से आच्छादित पहाड़ियों व गांवों को पार करते हुए आगे बढ़ने लगे। इस क्रम में हमलोगों ने कोदोटांड़, खूंटाहर, खेजबाली, जोभी आदि गांव पार किया। 
 
                         जैसे ही जयनगर गांव पहुंचे मधुबन से विभिन्न मंदिरों में चल रहे धार्मिक कार्यक्रमों की आवाज सुनाई देने लगी। कुछ ही देर मंदिर आदि भी दिखाई देने लगे। लगभग पांच मिनट बाद हमलोग मधुबन की उसी धरा पर थें जहा से सुबह परिक्रमा की शुरूआत की थी।एक दिन में 48 किलोमीटर की पदयात्रा संपन्न हो गयी। इस तरह आप दिन भर निरंतर प्रभु का ध्यान करते हैं तथा भावात्मक रूप से महाशक्ति से जुड़े रहते हैं।

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