Saturday, October 27, 2018

लिंगराज मंदिर : कलिंग शैली का सर्वश्रेष्ठ स्थापत्य


यूं तो भारत में ऐसे मंदिरों की लंबी सूची हैं जहां की भव्यता व सुंदरता वर्णन से परे हैं। यह लेख उस जगह के बारे में है जहां पहुंचते ही न केवल आपके मन में श्रद्धा, भक्ति व अध्यात्म की लहर उमड़ने लगती है बल्कि आप एक अनुपम कृति का साक्षात्कार भी करते हैं। जी हां, मैं बात कर रहा हूं उड़िसा राज्य स्थित सुप्रसिद्ध लिंगराज मंदिर की। उड़ीस की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित यह मंदिर स्थापत्यकला का अनुपम उदाहरण है। मंदिर की बनावट, निर्माण प्रणाली, सुक्ष्म से सुक्ष्म कारीगरी, मंदिर परिसर का भक्तिमय माहौल आपको अश्चर्यचकित कर देगा। यकीन मानिए यहां पहुंचते ही आप कुछ देर के लिए सब कुछ भूल जाऐंगे।
           सुबह दस बजकर पांच मिनट में हमारी लैंडिंग बिजु पटनायक अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट, भुवनेश्वर में हुई। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही इस बात का अहसास होने लगा था कि हमलोग अब मंदिरों के नगर में हैं। हमारी जिज्ञासा को कैब ड्राइवर व होटल ( जिस होटल में ठहरे थे) के प्रबंधक ने कुछ शांत किया। शाम को हमलोग बाहर निकले तथा भुवनेश्वर आने का ध्येय एक आटो वाले को बताया। उसने सलाह दी कि कुछ ही दूरी पर लिंगराज मंदिर है और हमे उस मंदिर का दर्शन अवश्य कर लेना चाहिए। ठीक पांच मिनट के बाद हमलोग एक विशाल व भव्य मंदिर के सामने खड़े थें।
             मंदिर के ठीक सामने वाहन स्टैंड था जिसमें कई तरह की गाड़ियां कतारबद्ध खड़ी थी। शाम होने के कारण तीर्थयात्रियों व स्थानीय लोगों की चहलकदमी तेज हो गयी थी। मंदिर प्रवेश द्वार के समीप कई ऐसे बोर्ड थे जो स्पष्ट संकेत दे रहे थे कि आप मंदिर के अंदर मोबाइल, कैमरा व अन्य निषेध सामग्री नहीं ले जा सकते हैं, कई काउंटर बने हैं जहां आप अपना सामान जमा कर सकते हैं मंदिर से बाहर निकलने के बाद फिर आप लें ले। सभी समान जमा कराने के बाद अब हमलोग मंदिर प्रवेश के लिए पूरी तरह तैयार थे। सुरक्षा के दृष्टिकोण से पुलिस बल तैनात थे तथा श्रद्धालुओं की जांच भी की जा रही थी।
           सीढ़ी उतरते ही जैसे ही आप मंदिर प्रांगण में पहुंचते हैं एक अदभुत वातावरण का अहसास होने लगता है। ठीक बगल में नल लगे हुए हैं जहां प्रवेश के पहले शुद्धीकरण के लिए आप अपना हाथ पैर धो सकते हैं। सामने ही एक भव्य मंदिर तथा ठीक उसके अगल-बगल दर्जनाधिक मंदिर है यानि मंदिरों का एक समूह है। इसके अलावा एक वृषभ यानि नंदी महाराज की मूर्ति भी प्रतिष्ठित है। सभी प्राचीन मंदिर हैं पर दिव्यता आज भी वैसे ही बरकरार है।
           मूल मंदिर में प्रवेश करते ही एक भक्तिमय माहौल का अहसास होता है। हमलोग जब अंदर गए उस भारी संख्या में भक्तगण बाबा लिंगराज का आरती दर्शन कर रहे थे। हमें बाबा का दर्शन करने, आरती लेने व प्रसाद लेने का अवसर मिला। उसके बाद हमने क्रम से गणेश भगवान, वैद्यनाथ भगवान, सोमनाथ आदि का दर्शन किया। यहां इतनी प्रतिमा व मंदिर है जिनकी सूची बनाना असान नहीं है और उस सूची को एक ब्लाग के पोस्ट में समाहित नहीं किया जा सकता है।

कब बना था यह मंदिर 

मंदिर परिसर में जानकारों व वहां के पुजारियों से बातचीत के क्रम में पता चला कि यह मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पहले राजा ययाति केषरी, अनन्त केशरी और ललातेन्दु केशरी इन तीन राजाओं के शासन के समय पर निर्मित हुआ था। इसका शिखर आमलक पत्थर से आच्छादित है तथा शिखर के उपर एक कलश भी स्थापित किया गया है। आगे बता दूं कि इस मंदिर को 1. श्री मंदिर 2. जगमोहन 3. नाटमंडप व 4. भोगमंडप में बांटा गया है। मंदिर देखते ही दिमाग में कई तरह के सवाल उमडने लगेंगे कि आखिर एक हजार साल पहले इतना भव्य मंदिर का निर्माण कैसे संभव हो सका।

सालोभर चलता रहता है उत्सव का सिलसिला   

यहां पूरे वर्ष कई तरह के उत्सव का आयोजन किया जाता है जैसे प्रवरण (मार्गशिर्ष महीना), पुष्याभिषेक (पौष महीना), मकर संक्रांति (माघ महीना) आदि। यहां भी रथयात्रा निकाली जाती है और यह रथयात्रा अषोकाष्टमी रथयात्रा के नाम से जाना जाता है। वहीं यह रथयात्रा हर वर्ष चैत्र माह शुक्ल अष्टमी के दिन आयोजित होती है। इसके अलावा शिव विवाह भी यहां का प्रसिद्ध उत्सव है। शिव विवाह ज्येष्ठ माह में मनाया जाता है।
         चूंकि मंदिर के अंदर कैमरा ले जाना प्रतिबंधित था इसलिए मैं यहां किसी भी तरह की तस्वीर नहीं ले सका। अतः इस लेख के लिए प्रतिकात्मक फोटो मैनें गूगल सर्च से डाउनलोड कर प्रकाशित किया है।

Friday, October 26, 2018

मधुबन से अन्य जैन तीर्थों के लिए यात्रा का विवरण


बिहार एवं झारखंड में राज्य में जैन धर्मावलंबियों का प्रमुख तीर्थ स्थल है। इन सभी का जिक्र इस ब्लाग में किया जा चूका है विस्तृत जानकारी के लिए लेख को पढ़ना ना भूलें। इन लेखों के शीर्षक कुछ इस प्रकार है - ऐसे करें पारसनाथ पर्वत की परिक्रमा, बिहार झारखंड के जैन तीर्थ स्थल, गिरिडीह जिला के जैन तीर्थस्थल तथा काफी रोमांचकारी है पारसनाथ पर्वत की यात्रा। सबसे पहले भक्तगण मधुबन ( शिखरजी) ही आते हैं इसके बाद ही अन्य स्थलों के लिए रवाना होते हैं। यहां परविहन की सुविधा उपलब्ध है। छोटी बड़ी सभी गाड़ियां सभी उपलब्ध है।

                                     यात्रा सूची

एक दिन की यात्रा श्वेतांबर एवं दिगंबर यात्रियों के लिए 
प्रातः पांच बजे शिखर जी से प्रस्थान 
1. पालगंज ( 15 किलो मीटर)                              2. ऋजुबालिका ( 5 किलोमीटर)
3. गिरिडीह ( 12 किलो मीटर)                              4. नवादा ( 178 किलो मीटर)
5. गुणावा ( 2 किलो मीटर)                                  6. पावापुरी ( 23 किलो मीटर)
7. नालंदा ( 23 किलो मीटर)                                 8. कुंडलपुर ( 2 किलो मीटर)
9. राजगृह ( 15 किलो मीटर) और यहीं पर यात्रा समाप्त

तीन दिनों की यात्रा दिगंबर यात्रियों के लिए
प्रथम दिन - प्रातः बजे शिखरजी से प्रस्थान,
1. गिरिडीह ( 32 किलो मीटर)                            2. देवघर ( 110 किलो मीटर)
3. मंदारगिरि ( 65 किलो मीटर)                         4. भागलपुर( 60 किलो मीटर)
5. चंपापुर ( 5 किलो मीटर), चंपापुर  धर्मशाला में रात्रि विश्राम
 दूसरा दिन  - प्रातः सात बजे चंपापुर से प्रस्थान
1. नवादा - ( 210 किलो मीटर)                          2. गुणावा ( 02 किलो मीटर)
3. पावापुरी - ( 23 किलो मीटर) और पावापुरी धर्मशाला में रात्रि विश्राम
तीसरा दिन - पावापुरी से प्रातः दस बजे प्रस्थान
1. नालंदा - ( 23 किलो मीटर)                           2. कुंडलपुर( 2 किलो मीटर)
3. राजगृह  ( 15 किलो मीटर) यहां यात्रा समाप्त
तीन दिनों की यात्रा  ष्वेतांबर यात्रियों के लिए
 प्रथम दिन - शिखरजी से प्रातः पांच बजे प्रस्थान
1.ऋजुबालिका - ( 210 किलो मीटर)                   2.गिरिडीह - ( 12 किलो मीटर)
3. भागलपुर - ( 240 किलो मीटर)                      3.चंपापूर  - ( 5 किलो मीटर) यात्रा समाप्त
 दूसरा दिन  - चंपापूर से प्रातः पांच बजे प्रस्थान
1.लछवाड़ - ( 140 किलो मीटर)                      2. गुणावा - ( 72 किलो मीटर)
3. पावापुरी - ( 23 किलो मीटर) और पावापुरी में ही रात्रि विश्राम
तीसरा दिन   - पावापुरी से प्रातः दस बजे प्रस्थान
1. नालंदा - ( 23 किलो मीटर)                        2. कुंडलपुर - ( 2 किलो मीटर)
3.  राजगृह -( 210 किलो मीटर) और राजगृह में ही यात्रा समाप्त। यहां आपको बता दें कि राजगृह से 65 किलोमीटर की दूर पर गया जंक्शन तथा 110 किलोमीटर की दूरी पर पटना जंक्शन है।



Wednesday, October 24, 2018

ऐसे करें पारसनाथ पर्वत की परिक्रमा


पारसनाथ पर्वत

पारसनाथ पर्वत जैनियों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। भक्तगण पर्वत स्थित मंदिरों व टोंकों में जाकर पूजोपासना करते हैं। पर यहां पूरे पर्वत की परिक्रमा करने की भी परंपरा है। समय- समय पर भक्तों का जत्था पर्वत की परिक्रमा करने को ले निकलता है। चूंकि परिक्रमा करना थोड़ा मुश्किल होता है तथा अधिकांश रास्ता जंगलों से होकर गुजरता है इसलिए ज्यादा संख्या में ही यात्रा पर निकलना बेहतर होता है। इस लेख में परिक्रमा से संबंधित पूरी यात्रा का वृतांत साझा कर रहा हूं। 

         वृतांत शुरू करूं इससे पहले आपको परिक्रमा के महत्व को बता दूं। परिक्रमा के महत्व पर हरेक व्यक्ति विशेष की अपनी अपनी राय है।पर समान्य सी बात यह है कि इस पर्वत से 20 तीर्थंकरों के अलावा असंख्य मुनियों ने निर्वाण प्राप्त किया है। उनकी चैतन्य विद्युत धारा से यह पर्वत माहशक्ति बन गया है। जब लघु शक्तिधारी जीव इस महाशक्तिधारी पर्वत की परिक्रमा करता है तब जीव एवं महाशक्ति भावात्मक धागे से आपस में जुड़ जाते हैं। इसी स्थिति में जीव के अंदर शक्ति का संचार होने लगता है। जीव की आत्मा विकसित होने लगती है यानि सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् चरित्र का संस्कार आने लगता है। इसके अलावा भी शास्त्रों में विद्वानों ने अपने अपने मत दिए हैं। खैर, मैं आपको परिक्रमा का अनुभव बता रहा हूं।

                 साधुओं की एक टोली परिक्रमा के लिए निकल रही थी साथ में दर्जनाधिक भक्त भी शामिल थे। मै भी उन्हीं के साथ यात्रा में शामिल हो गया। हलांकि यात्रा शुरू होने के पहले मन में एक अजीब सा द्वंद चल रहा था। अव्वल बात तो यह कि 48 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी थी, दूसरी पूरा का पूरा रास्ता उबड़- खाबड़, पथरीला व जंगली था। सुबह पांच बजे पूरा जत्था जयकारा लगाते हुए यात्रा के लिए निकला। मैंने भी पूरे विश्वास के साथ आगे की और कदम बढ़ाया। सूर्य की किरणों ने अब तक धरती का स्पर्श नहीं किया था और हमलोगों पूर्व दिशा की ओर ही आगे बढ़ रहे थे। लगभग तीस मीनट के बाद सीतनाला मिला जहां स्वच्छ व निर्मल जलधारा बह रही थी। कुछ लोगों ने हाथ, पैर धोए, कल -कल करती हुई जलधारा व कोलाहल से दूर शांत वातावरण का ही प्रभाव था कि अनायास ही कदम आगे बढ़ने लगे।

पहाड़ी नाला

आगे बढ़ते हुए हमलोग बेलाटांड़ गांव के समीप पहुंच गए। यहां से भी पर्वत स्थित चं्रदप्रभु टोंक व पार्श्वनाथ टोंक स्पष्ट दिख रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उस महाशक्ति से जुड़े हुए हों। हमलोग आगे बढ़ते गए और क्रम से बाराडीह गांव, बारीटांड़ गांव, चर्च व स्कूल, बोकराडीह गांव, चतरोबेड़ा गांव आदि मिलते गए। यह सब ऐसी जगह थी जिसका सही सही वर्णन कर पाना बहुत मुश्किल है। यूं कहें शब्दों से बयां कर पाना असंभव सा लगता है मानो सीधे सीधे प्रकृति की सुंदरता से साक्षात्कार कर रहे हैं। बीच बीच में मशक्कत भरी यात्रा मिलती है पर जैसे ही आपकी नजर सूर्य की सीधी किरणों से चमकते पार्श्वनाथ व चंद्रप्रभु की टोंक, कुछ ही पल बाद पर्वत की चोटियों से अठखेलियां करती बादल की टुकड़िया, पवन के झांको से झुमती लताओं जैसे नयनाभिराम दृष्यों पर पड़ती है आप कुछ देर के लिए खो जाते हैं।

 जंगली पुष्प वृक्ष
कभी कभी कठीन डगर कब समाप्त हो जाता है आपको इसका अंदाजा भी नहीं मिलता। जंगल का एक भाग समाप्त होने के बाद आप एक बार फिर कोलाहल से भी दुनिया में प्रवेश कर जाते है। घड़ी में साढ़े दस बज रहे थे और हमलोग अब जीटी रोड के किनारे किनारे चल रहे थे। बता दें जीटी रोड दिल्ली से कोलकाता को जोड़ती है, पूर्व दिशा की ओर कोलकाता है। कुछ दूर चलने के बाद हमलोग निमियाघाट जैन मंदिर पहुंचे जहां भक्तों ने विश्राम किया। हलांकि अब तक हमलोग कई जगह रूक कर आराम कर चुके थे पर यहां विश्राम की अवधि कुछ लंबी थी।

एक और जंगली पुष्प वृक्ष

 निमयाघाट दिगंबर जैन मंदिर का पूरा विवरण हमने इस ब्लाग के लेख में दिया है। मंदिर मेंं जानने के लिए कृप्या गिरिडीह जिला के जैन दर्शनीय स्थल जरूर पढ़ें। अब तक हमलोगों ने लगभग 35 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर ली थी। वैसे लोग जो एक दिन में पूरी यात्रा नहीं कर पाते हैं वे यहां रात्रि विश्राम करते हैं तथा दूसरे दिन प्रातः काल शेष यात्रा पूरी करते हैं। खासकर साधु वर्ग पूजा, साधना के लिए रूकते है। लगभग दो बजे पुनः हमलोग की यात्रा एक अंतराल के बाद शुरू हो गयी और कुछ देर में हमलोग फिर एक बार पुरी तरह प्रकृति की गोद में थे। यहां की खूबसूरत वादियां अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। कभी रास्ता हिम्मत और धेर्य की परीक्षा लेने लगता था तो कभी सहज व सरल लगने लगता। घने जंगलों से आच्छादित पहाड़ियों व गांवों को पार करते हुए आगे बढ़ने लगे। इस क्रम में हमलोगों ने कोदोटांड़, खूंटाहर, खेजबाली, जोभी आदि गांव पार किया। 
 
                         जैसे ही जयनगर गांव पहुंचे मधुबन से विभिन्न मंदिरों में चल रहे धार्मिक कार्यक्रमों की आवाज सुनाई देने लगी। कुछ ही देर मंदिर आदि भी दिखाई देने लगे। लगभग पांच मिनट बाद हमलोग मधुबन की उसी धरा पर थें जहा से सुबह परिक्रमा की शुरूआत की थी।एक दिन में 48 किलोमीटर की पदयात्रा संपन्न हो गयी। इस तरह आप दिन भर निरंतर प्रभु का ध्यान करते हैं तथा भावात्मक रूप से महाशक्ति से जुड़े रहते हैं।

Tuesday, October 23, 2018

बिहार - झारखंड के जैन तीर्थ स्थल



लछवाड़ मंदिर

बिहार - झारखंड में जैन धर्मावलंबियों के कई प्रसिद्ध तीर्थस्थल हैं। मैनें अपने ब्लाग में पारसनाथ, मधुबन आदि के बारे में भी लिखा है। मैं यहां आपको ये बताना चाहूंगा कि जैन धर्म के अनुसार तीर्थ क्षेत्र को तीन भागों में बांटा जा सकता है जो क्रमशः निर्वाण क्षेत्र (सिद्ध क्षेत्र), कल्याण क्षेत्र एवं अतिशय क्षेत्र है। जिन जगहों पर तीर्थंकरों या मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया हो उस क्षेत्र को निर्वाण या सिद्ध क्षेत्र कहा जाता है। वहीं जिन क्षेत्रों में तीर्थंकर भगवान के गर्भ, जन्म, दीक्षा एवं केवल ज्ञान आदि में कोई एक कल्याण संपन्न हुए हो तो उस क्षेत्र को कल्याण क्षेत्र कहा जाता है। इसके अलावा जिन जगहों में मुनियों या आराधकों ने आत्म शक्ति का चमत्कार प्रकट किया हो या फिर कोई चमत्कारी प्रतिमा प्रतिष्ठित हो उन क्षेत्रों को अतिशय क्षेत्र कहा जाता है। 

            इस लेख में यही बताने जा रहा हूं कि बिहार एवं झारखंड की भूमि में तीनों प्रकार के तीर्थ है। पारसनाथ, मधुबन तथा गिरिडीह जिला क्षेत्र में पड़ने वाले जैन तीर्थ स्थलों का विवरण पूर्व के लेख में दे चूका हूं। उन जगहों की जानकारी के लिए कृप्या वे लेख पढ़ें। शुरूआत करते हैं देवधर से। देवघर जिला मुख्यालय स्थित दिगंबर जैन मंदिर में 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजमान है। यहां एक पुस्तकालय भी है जहां जैन दर्शन से संबंधित विभिन्न प्रकार की पुस्तके हैं। हलांकि यह क्षेत्र जैन तीर्थ की सूची में नहीं है। चूंकि यहां मंदिर था इसलिए मैनें इसका विवरण दे दिया।
1. मंदारगिरि -  देवघर से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर मंदारगिरि है जो दिगंबर मतानुसार 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य का दीक्षा एवं निर्वाणकल्याणक क्षेत्र है। यह क्षेत्र बिहार के बांका जिला में पड़ता है। इस पहाड़ी की उंचाई डेढ़ किलोमीटर है वहीं पर्वत के नीचे मंदिर, पापहारिणी तालाब एवं कुण्ड आदि दर्शनीय हैं। पर्वत के उपर एक बड़ा जैन मंदिर भी है।

2. चंपापुर - मंदारिगिरि से चंपापुर की दूरी 65 किलोमीटर दूर है। यहां स्थित जैन मंदिर भगवान वासुपूज्य को समर्पित है। चंपापुर में दिगंबर व ष्वेतांबर की तीन कोठियां है। दिगंबर जैन तेरहपंथी कोठी में भगवान वासुपूज्य का प्राचीन मंदिर, मानस स्तंभ, सुरंग, मनोहारी झांकियां आदि दर्जनाधिक चीजें दर्षनीय हैं। वहीं दिगंबर जैन बीसपंथी कोठी में भी भगवान वासुपूज्य का जिनालय है। वहीं श्वेतांबर जैन धर्मशाला के अंदर भी दो जिनालय एवं दादा बाड़ी दर्शनीय है। यह स्थल बिहार के भागलपुर जिले में स्थित है।

3. लछवाड़ - चंपापुर से लगभग 140 किलोमीटर की दूरी पर है लछवा़ड़ जो बिहार के जमुई जिला में स्थित है। श्वेतांबर मत के अनुसार लछ़वाड़ भगवान महावीर का जन्म दीक्षा स्थल है। यहां पर भगवान महावीर का एक भव्य मंदिर व धर्मशाला निर्मित है। धर्मशाला से दक्षिण की ओर क्षत्रियकुंड नामक एक छोटी सी पहाड़ी है। कहा जाता है कि पहाड़ी का वन ज्ञातखंड वन कहलाता है जहां भगवान महावीर ने दीक्षा ली थी। हलांकि इसमें मतभेद भी सामने आता है।

4. गुणावाजी - लछवाड़ से गुणावा की दूरी लगभग 72 किलोमीटर है। यह बिहार के नवादा जिला में स्थित है तथा भगवान महावीर के प्रधान गणधर इन्द्रभूति गौतम का केवल ज्ञान क्षेत्र है। गुणावा में एक दिगंबर धर्मशाला है जिसमें एक शिखर बंद मंदिर हैं।

5. पावापुरी - गुणावा से पावापुरी की दूरी 23 किलोमीटर है। यह भगवान महावीर की निर्वाण स्थली है अतः यह सिद्ध क्षेत्र है। भगवान महावीर ने अंतिम देशना के बाद र्कार्तक कृष्ण चर्तुदषी को रात्रि के समय निर्वाण प्राप्त किया था। यहां जल मंदिर, प्राचीन एवं नवीन समवशरण, भगवान महावीर की चौमुखी प्रतिमा, प्राचीन स्तूप समेत दर्जनाधिक दर्शनीय स्थल है।

6. कुंडलपुर - सिद्ध क्षेत्र पावापुरी से कुंडलपुर की दूरी 25 किलोमीटर है। दिगंबर मत के अनुसार यह स्थल भगवान महावीर की गर्भ, जन्म व तप भूमि  है। हलांकि इस बात को ले मतभेद भी है। वहीं श्वेतांबर परंपरा के अनुसार यहां पर भगवान महावीर स्वमा के गणधर इंद्रभूति, अग्निभूति एवं वायुभूति का जन्म स्थान है। यहां दिगंबर एवं श्वेतांबर दोनों संप्रदाय की धर्मशालाएं हैं तथा इन धर्मशालाओं में मंदिर है।

7. राजगृह - कुंडलपुर से राजगृह की दूरी 17 किलोमीटर है। यहां पांच पहाड़ हैं जिसे पंचपहाड़ी भी कहा जाता है। इन्हीं में से एक पर्वत पर भगवान महावीर की दिव्य ध्वनी खिरी थी। यह स्थल बीसवें तीर्थंकर सुव्रतमुनि के गर्भ, तप व केवलज्ञान कल्याणक क्षेत्र है। यहां बहुत से दर्शनीय स्थल है।

Saturday, October 20, 2018

गिरिडीह जिला के जैन दर्शनीय स्थल


मधुबन के अलावा आसपास के क्षेत्रों में भी जैन धर्मावलंबियों के कई दर्शनीय स्थल हैं। इन स्थलों में भी तीर्थयात्रियों का आवागमन सालोभर चलता रहता है। इस लेख में मधुबन से तीस किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी जैन दर्शनीय स्थलों की जानकारी दे रहा हूं।

1. पालगंज - मधुबन से लगभग 16 किलोमीटर की दूरी पर है पालगंज जैन मंदिर। इस मंदिर भगवान पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा है। पालगंज एक गांव है जो कभी पालगंज राज्य की राजधानी हुआ करती थी। यहां शिखर बंद प्राचीन मंदिर है। जानकारों का कहना है पार्श्वनाथ भगवान की यह मूर्ति चतुर्थ काल की है। वहीं यहां एक यह भी परंपरा है कि संगमरमर चूर्ण से उल्टा साखिया ( उल्टा स्वस्तिक) बनाकर मन्नत मांगी जाती है और मन्नत पूरी होने के बाद दुबारा यहां आकर सीधा साखिया बनाया जाता है। विशेष बात यह कि यहां श्वेतांबर या दिगंबर दोनों संप्रदाय के लोग दर्शन पूजा करते हैं।
ऋजुबालिका मंदिर

ऋजुबालिका मंदिरमें विराजमान भगवान महावीर की प्रतिमा 


2. ऋजुबालिका - पालगंज से ठीक पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ऋजुबालिका मंदिर। यह मंदिर बराकर नदी के तट पर स्थित है। यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया है जिसमें भगवान महावीर की एक अद्भुत प्रतिमा विराजमान की गयी है। यह मंदिर केवल ष्वेतांबर समुदाय का है। कई लोगों का मत है कि भगवान महावीर ने इसी स्थल पर केवल ज्ञान प्राप्त किया था। यहां का षांत प्राकृतिक वातावरण तथा मंदिर परिसर से नदी की बहती धारा को देखना मन को काफी सुकून मिलता है।

3. गिरिडीह - गिरिडीह जिला मुख्यालय में श्वेतांबर और दिगंबर दोनों समुदाय के जैन मंदिर स्थित है। बड़ा चौक के समीप दिगंबर जैन मंदिर है वहीं उस स्थल से कुछ दूरी पर यानि रेलवे स्टेशन के समीप श्वेतांबर जैन मंदिर है। पंचतीर्थ यात्रा के क्रम में तीर्थयात्री इन मंदिरों का दर्शन करते हैं।

4. निमियाघाट - जहां एक ओर पालगंज, ऋजुबालिका व गिरिडीह मधुबन से उत्तर दिशा पर चलने से क्रम में मिलता है वहीं निमियाघाट ठीक विपरित दिशा में स्थित है। निमियाघाट मधुबन से 31 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां एक दिगंबर जैन मंदिर है जिसका निर्माण 1998 में किया गया था। भले ही मंदिर 1998 में बना हो पर यहां विराजमान भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा चतुर्थ काल की बतायी जाती है। मूर्ति के उपर नौमुखी छत्र है। यहां ठहरने के लिए धर्मशाला भी बनी है। यह मंदिर जीटी रोड के किनारे स्थित है।

Friday, October 12, 2018

जैन धर्मावलंबियों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है मधुबन



मधुबन का विहंगम दृश्य
पारसनाथ पर्वत की खूबसूरत वादियों में बसा मधुबन जैन धर्मावलंबियों का एक तीर्थस्थल है जो काफी तेजी से देश-विदेश में प्रसिद्ध हो रहा है। बदलते समय के साथ यहां आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। एक दशक पहले यहां केवल कुछ विशेष अवसरों पर ही  तीर्थयात्रियों की भीड़ होती थी पर  अब  सालोंभर यात्रियों का आगमन कमोबेश होते रहता है। मधुबन में दर्जनाधिक जैन मंदिर व धर्मशालाएं बनी हैं। इन्हीं धर्मशालाओं में तीर्थयात्री ठहरते हैं तथा मधुबन से ही पारसनाथ पर्वत की  चढ़ाई करते है। विदित हो पर्वत के उपर रात में ठहरने की कोई सुविधा नहीं है।
  मधुबन में दिगंबर व श्वेतांबर पंथ के  लिए अलग अलग धर्मशालाएं बनी हैं। जैन श्वेतांबर कोठी श्वेतांबर मतावलंबियों की सबसे पुरानी धर्मशाला है। इसके अलावा कच्छी भवन, भोमिया भवन, श्री धर्म मंगल जैन विद्यापीठ, तलेटी तीर्थ, नाहर भवन आदि कोठियां भी है। जहां आधुनिक सुविधा युक्त कमरे भी उपलब्ध हैं। वहीं दिगंबर मतावलंबियों के लिए श्री दिगंबर जैन तेरहपंथी कोठी, श्री दिगंबर जैन बीसपंथी कोठी, शास्वत ट्रस्ट, उत्तर प्रदेश प्रकाश भवन, मोदी भवन आदि कई धर्मशालाएं हैं। हलांकि ऐसा नहीं है कि एक दिगंबर ही दिगंबर संस्था में ठहर सकता है। कोई भी पंथ का हो कहीं भी ठहर सकता है। इन संस्थाओं में आधुनिक सुविधायुक्त कमरे मिल जाऐंगे। आमतौर पर पांच सौ रूप्ये से एक हजार रूप्ये के बीच आपको कमरे मिल जाऐंगे जो चौबीस घंटे के लिए आरक्षित होगा। इन संस्थाओं के परिसर में कई भव्य व सुंदर मंदिर भी हैं जहां श्रद्धालुगण पूजा अर्चना करते हैं। संस्थाओं के अंदर भोजनशाला की भी व्यवस्था उपलब्ध है बावजूद चाहे तो आप बाहर बाजार में भी खाना खा सकते हैं। बाहर भी कुछ होटल हैं जहां अच्छा खाना मिलता है।
        तीर्थयात्रियों को किसी  भी प्रकार की परेशानी न हो इसके लिए अलग-अलग संस्थाओं द्वारा निःशुल्क हौम्योपेथिक व आयुर्वेदिक औषधालय चलाया जाता है। वहीं एक श्री दिगंबर जैन हास्पीटल एंड रिसर्च सेंटर भी है जहां तीर्थयात्रियों के लिए अंग्रेजी दवाई की भी सुविधा उपलब्ध है। हलांकि यह निःशुल्क नहीं है फिर भी बहुत कम शुल्क लिया जाता है।
          मधुबन में घूम रहे हैं तो जैन म्यूजीयम देखना न भूलें। जितयशा फाउंडेशन द्वारा संचालित जैन म्यूजीयम न केवल सर्वधर्म भाव का संदेश देता है बल्कि जैन दर्शन से संबंधित पूरी जानकारी आपको मिल जाएगी। इसके अलावा भी मधुबन के आसपास कई दर्शनीय स्थल है। ( इन स्थलों का पूरा विवरण एक अलग पोस्ट में दूंगा)

कैसे पहुंचे 
  -  मधुबन झारखंड  राज्य के गिरिडीह जिला में स्थित है। पारसनाथ स्टेशन (21 किमी) व गिरिडीह स्टेशन (32 किमी) मधुबन के निकटतम स्टेशन है। इन जगहों से मधुबन के लिए हमेशा छोटी बड़ी गाड़ियां मिलती रहती है। हलांकि देर शाम के  बाद  मधुबन जाने से बेहतर स्टेशन के समीप बने धर्मशालाओं में रूकना है।
 
   -   बिरसा मुंडा एयरपोर्ट, रांची (200 किमी) व नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा, कोलकाता ( 350 किमी) नजदीकी एयरपोर्ट है। यहां से सीधे केब बूक कर आप मधुबन जा सकते हैं या फिर ट्रेन से पारसनाथ स्टेशन होते हुए जा सकते हैं।

कब पहुंचे
   सालोभर तीर्थयात्रियों का आगमन होता है। पर जून, जुलाई यहां के लिए यात्रा की योजना न बनाये तो बेहतर ही होगा। अगर आप होली या श्रावण सप्तमी में मधुबन जा रहे हैं तो बेहतर तो होगा कि पहले से ही रूम बूक कर लें अन्यथा वहां जाने के बाद  आपको परेषानी हो सकती है।


Thursday, October 4, 2018

काफी रोमांचकारी है पारसनाथ पर्वत की यात्रा


पारसनाथ पर्वत के उपरी हिस्सा का विहंगम दृश्य

 पारसनाथ पर्वत जैन धर्मावलंबियों का पवित्र तीर्थस्थल है। जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने यहां निर्वाण प्राप्त किया है यही वजह है कि हर एक जैन धर्मावलंबी अपने जीवन में एक बार यहां जरूर आना चाहते हैं। शास्त्रकारों का कहना है - ''एक बार बंदे जो कोई ताकि नरक पशु गति नहीं होई'' अर्थात पूरी भावना से जो भी व्यक्ति एक बार इस पर्वत की वंदना कर लेता है उसे फिर नरक या पशु गति प्राप्त नहीं होती है। हर वर्ष हजारों की संख्या में यहां तीर्थयात्रियों का आगमन होता है। इस पर्वत की यात्रा काफी सुखद अहसास दिलाती है। मैने खुद एक सौ बार से भी ज्यादा इस पर्वत की यात्रा कर चुका हूं। चार हजार चार सौ अस्सी फीट की चढाई पूरी करने के बाद यात्रा के इस अनुभव ने ही मुझे यह पोस्ट लिखने को प्रेरित किया है। दो दिन पहले की यात्रा ( 03/10/2018)  का वृतान्त साझा कर रहा हूं।
                                       आम तौर पर पर्वत यात्रा की शुरूआत मधुबन ( मधुबन का पूरा विवरण एक अलग लेख में दूंगा) से सुबह दो बजे से शुरू हो जाती है। मैनें सुबह साढे़ चार बजे पर्वत की चढ़ाई शुरू कर दी। आपको यहां बता दूं कि जैन धर्म में मूल रूप से दो पंथ हैं- एक दिगंबर पथ तथा दूसरा श्वेतांबर। श्वेतांबर मतावलंबी यात्रा करने से पहले मधुबन स्थित जैन श्वेतांबर कोठी के भोमिया जी मंदिर में भोमिया बाबा का दर्शन करना नहीं भूलते। मानते हैं कि भोमिया बाबा के दर्शन से पर्वत यात्रा र्निविघ्न पूरी होती है। सुबह जब तक श्वेतांबबर कोठी का गेट नहीं खुलता तब तक बिना दर्शन किए श्वेतांबरी आगे नहीं बढ़ते। सुबह साढ़े चार बजे अंधेरा ही था पर डोली वाले, गोदी वाले व कुछ दुकानदार पूरी तरह जाग चुके थे। वे व्यक्ति जो शारिरिक रूप से कमजोर होते हैं तथा पैदल पर्वत चढ़ने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं वे डोली बूक कर लेते हैं। डोली दो तरह की होती है। एक सादी डोली जिसे दो व्यक्ति उठा कर ले जाते हैं तथा दूसरी कुर्सी डोली होती है जिसे चार लोग उठा कर ले जाते हैं। हलांकि कुर्सी डोली ज्यादा आरामदायक होती है। दोनों का अलग अलग रेट है। डोली वाले यात्री के वजन के हिसाब से डोली का किराया तय करते हैं। अगर आप एक दिन पूर्व कोई डोली बूक नहीं कर पाये हैं तो भी कोई बात नहीं रास्ते में आपको कई डोली वाले मिल जाऐंगे। पर कोई डोली बूक करने से पहले डोलीवालों से डोली का किराया तय कर लें ताकि बाद में कोई किचकिच न हो तथा आपकी यात्रा में भी किसी प्रकार का खलल न पड़े।
                                                   पांच बजे मैं पर्वत की तलहटी से पर्वत की चोटी की ओर आगे बढ़ा। शुरूआती आधे घंटे में लगभग डेढ़ किलोमीटर ही चढ़ पाया था। अन्य यात्रियों की भी सांसे फूल रही थी जिन लोगों ने डोली छोड़कर पैदल चलने का निर्णय लिया था वे अब डोली में बैठ चुके थे। तलहटी से डेढ़ किलोमीटर की उंचाई पर कलीकुंड धाम नामक एक श्वेतांबर जैन मंदिर है। कुछ लोगों ने इस मंदिर में जाकर दर्शन किया फिर आगे की चढाई शुरू की। कुछ दूरी तय करने के बाद हम लोग भाता घर पहुंच चुके थे। भाता घर पहुंचने से पहले ही हमें इस यात्रा में पहली बार पानी बहने की आवाज सुनाई दी तथा भाता घर पहुंचते ही एक नाला दृष्टिगोचर हुआ। इस नाला का नाम गंधर्व नाला है, डोली वालों ने यहां थोड़ी देर विश्राम किया। लौटते समय यहां पर तीर्थयात्रियों को भाता ( नाश्ता) दिया जाता है। यहां से आगे बढ़ने के बाद एक और नाला मिलता है जिसका नाम सीता नाला है। यहां आते आते थकान से शरीर निढ़ाल होने लगता है। बैठने का मन कर रहा होता है। यहां नींबू -पानी, चाय आदि की कई दुकाने हैं लिहाजा लोग यहां बैठकर सुस्ताना नहीं भूलते हैं। यहां खाने पीने का सामान आपको महंगा लग सकता है। यहां के दुकानदार मजदूरी देकर ये सभी सामान मधुबन से मंगवाते है, घर छोड़कर दिनरात पहाड़ में रहते हुए दुकानदारी करते हैं तो स्वभावकि है कि ज्यादा कीमत पर बेचेंगे।
                                                      सीतानाला के बाद से खड़ी चढ़ाई शुरू हो जाती है। फिर भी यात्रियों के बीच पर्वत की चोटी तक जाने का उत्साह आपको दंग कर देगा।  पर्वत यात्रा करने की प्रबल भावना, उत्साह व उमंग के समक्ष लगभग पांच हजार फीट की उंचाई बौनी प्रतीत होने लगती है। तीर्थंकरों का जयकारा लगाते हुए आगे बढ़ती भक्तों को टोली थक चुके लोगों में भी एक नयी उर्जा का संचार करती है। मुश्किल से एक - एक कदम बढ़ाते हुए जब भक्तगण चौपड़ाकुंड तक पहुंचते हैं। यहां एक दिगंबर जैन मंदिर है यहां दर्शन पूजा करने के बाद जब उन्हें यह पता चलता है कि वे अब लगभग पहुंच चुके है। तो कदम बरबस ही मंजिल की ओर तेजी से बढ़ने लगते हैं। हलांकि यह फासला चंद मिनटों का ही है लेकिन इस जगह की खड़ी चढ़ाई किसी का भी उत्साह मंद कर देने में सक्षम है।


पर्वत स्थित एक टोंक

                      मेरी घड़ी के अनुसार इस वक्त का समय आठ बजकर पांच मिनट है। मैं अभी गौतम स्वामी टोंक पर हूं यानि लगभग तीन घंटे में मैनें पर्वत की चढ़ाई पूरी कर ली है। पूरब में सूरज चमक रहा है वहीं मंद मंद बह रही ठंढ़ी हवा जब शरीर का स्पर्श करती है तो लगता है मानों शरीर का थकान हर ले रही है साथ ही साथ मंदिर व टोंको की इस दुनिया में गर्मजोशी से स्वागत कर रही हो। मैनें कई लोगों को देखा जो यहां सुस्ताते हुए प्रकृति की इस अनुपम छटा को एकटक निहार रहे थे। इस अनुपम दृश्य को अपनी आंखों में समेट लेना चाह रहे थे। वहीं कुछ अपने मोबाइल व कैमरे में भी यहां के हरेक नयनाभिराम दृश्य को कैद कर रहे थे। गौतम स्वामी टोंक में दर्षन पूजा के बाद भक्तों का कारवां पूर्व दिशा की ओर बढ़ने लगता है। यह रास्ता मुनि सुव्रतनाथ टोक होते हुए श्री चंद्रप्रभु टोंक तक जाता ह। गौतम स्वामी टोंक से चंद्रप्रभु टोंक की दूरी तीन किलोमीटर है। हलांकि कुछ लोग गौतम स्वामी टोंक से सीधे जलमंदिर चले जाते हैं जो जिसकी दूरी महज डेढ़ किलोमीटर है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि अगर ग्यारह बजे के बाद गौतम स्वामी टोक पहुंचते हैं तो फिर बेहतर होगा कि चंद्रप्रभु टोक न जायें क्योंकि बाद में वह क्षेत्र सुनसान हो जाता है।

जल मंदिर
                                            चंद्रप्रभु टोंक के बाद भक्तों का जत्था अनंतनाथ, शीतलनाथ तथा अभिनंदन स्वामी का टोंक होते हुए जलमंदिर पहुंचता हैं। जलमंदिर में सभी तीर्थंकरों की प्रतिमा विराजमान है। मुख्यतः यहां श्वेतांबर मतावलंबी पूजोपासना करते हैं। जलमंदिर के बाद पुनः यात्री गण गौतमस्वामी टोंक पहुंचते हैं। उसके बाद पश्चिम दिशा में पडने वाले सभी टोंकों का दर्शन करते हुए अंत में पार्श्वनाथ मंदिर पहुंचते है। गौतम स्वामी टोंक से पार्श्वनाथ मंदिर की दूरी लगभग डेढ़ किलोमीटर है। पूरे पर्वत में 24 तीर्थंकरों के अलावा 6 अतिरिक्त टोंक हैं। मधुबन से गौतम स्वामी टोंक तक आने में 9 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती वहीं पर्वत के उपर सभी टोंको का दर्शन करने में भी आपको 9 किलोमीट का फासला तय करना पड़ेगा। इस तरह कुल मिलाकर आने जाने व मंदिर दर्शन करने में 27 किलोमीटर की पद यात्रा पूरी करनी होगी। यह मंदिर जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ  का है तथा यह पर्वत की सर्वोच्च चोटी पर स्थित है। बताया जाता है कि भगवान पार्श्वनाथ  के नाम पर ही इस पर्वत का नाम पारसनाथ पड़ा। यहां से दूर दूर तक पर्वत की खूबसूरत वादियों को देखना, सूर्य की किरणों में विभिन्न टोंको को चमकते हुए देखना, कही दूर से आ रही ट्रेन की आवाज, जीटी रोड पर धुंधली धुंधली सी नजर आती वाहनों की कतार, सामने की चट्टानों पर अठखेलियां करती बंदरों की टोलियां तथा तरह तरह के पक्षियों का कलरव। ये कुछ एसी चीजें हैं जिसे शब्दों से बयां कर पाना मुश्किल है, बस आप इसे महसूस कर सकते हैं।
                           

पार्श्वनाथ मंदिर

पार्श्वनाथ मंदिर में दर्शन करने के बाद जब मेरी नजर घड़ी पर पड़ी तो ग्यारह बज चुके थे और मेरी यात्रा पूरी  हो चुकी थी। अब वापस लौटने की यानि पर्वत से नीचे उतरने की बारी थी। डाकबंगला होते हुए नीचे उतर गया। लगभग ढाइ्र्र घंटे बाद मैं मधुबन वापस आ चुका था।
                               इस पोस्ट में मैंने पारसनाथ पर्वत यात्रा से संबंधित पूरी जानकारी समेटने की कोशिश की है हलांकि लेख ज्यादा लंबा होने लगा है। फिर भी कुछ चीजों को एक बार फिर  याद दिला दूं।


क्या न करें -
           शार्ट कर्ट रास्ता कभी न लें। एक तो इससे थकान बढ़ती है उपर से रास्ता ग़ड़बड़ाने की संभावना बनी रहती है। हमेशा पैदल वंदना मार्ग पर ही चलें।
          - बंदरों को कुछ भी हाथ से खिलाने की कोशिश न करें।
पर्वत यात्रा कब करें -
             यूं तो अब सालोभर कमोबेश तीर्थयात्रियों का आगमन होने लगा है। पर  होली, सावन सप्तमी, दिवाली आदि ऐसे अवसर हैं जब भारी संख्या में तीर्थयात्री पहुचते हैं।

            पारसनाथ पर्वत यात्रा से संबंधित विडियो यहां देखें