Monday, February 25, 2019

दुःखहरणनाथ धाम : मनोकामना को ले यहां पहुंचते हैं शिवभक्त

मुख्य द्वार 
दुःखहरणनाथ धाम, एक ऐसा धाम जहां लोग इस उम्मीद के साथ पहुंचते हैं कि यहां मत्था टेकते ही उनका दुःख समाप्त हो जायेगा। झारखंड के गिरिडीह जिला मुख्यालय से लगभग लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर उसरी नदी तट पर स्थित इस मंदिर में दूर-दूर से भक्तगण पूजोपासना करने पहुंचते हैं। खास कर सोमवार को यहां भारी भीड़ उमड़ती है। कोलाहल से दूर इस शांत वातावरण में असीम शांति की अनुभूति होती है। मैं 16 फरवरी को बाइक से दुःखहरणनाथ धाम गया।
    सुबह नौ बजे के लगभग मैं गिरिडीह जिला मुख्यालय पहुंच चुका था। शहर से इस धाम की दूरी लगभग आठ किलोमीटर की है। जैसे आप गिरिडीह से धनबाद की ओर बढ़ते हैं लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर बायीं तरफ एक अलग मार्ग मिलेगा। इस स्थल पर एक प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस मार्ग में प्रवेश करते ही कई फैक्ट्रियां मिली। फैक्ट्रियों का क्षेत्र समाप्त होते ही मंदिर का दर्शन होने लगा। शांत क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है। यह आस्था व विश्वास ही है कि लोग दूर दराज क्षेत्रों से इस स्थल पर अपनी मनोकामना लेकर आते है।
   नौ बजकर बीस मिनट पर मैं पहुंच चुका था। यहां का माहौल पूरी तरह शांत था। मंदिर के ठीक सामने ही एक नदी बहती है। इस उसरी नदी  तक पहुंचने के लिए पक्की सीढ़ी बनायी गयी है। मैं भी नदी पहुंचा वहां पूजा के लिए जल लिया व मंदिर परिसर में प्रवेष किया। यहां एक ओर भगवान षिव का मंदिर है तो ठीक उसके सामने माता पार्वती का मंदिर है। इसके अलावा मंदिर परिसर में कई अन्य देवी देवताओं का भी मंदिर है। हलंाकि मंदिर से जुड़ी कोई पुरानी जानकारी नहीं मिली पर बताया जाता है कि यह मंदिर काफी प्राचीन है। षिवभक्त पूरी आस्था व भक्तिभाव से अपनी मनोकामना को ले यहां पूजा अर्चना करने पहुचते हैं। प्रत्येक सोमवार के अलावा सावन पूर्णिमा व महाशिवरात्रि जैसे विशेष अवसरों पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।


मंदिर परिसर 

शिवलिंग

नदी जाने का मार्ग


मंदिर के समीप की नदी


Thursday, January 31, 2019

तो यादगार बन जाएगाा सफर

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: गूगल सर्च)
घूमने का शौक लगभग हर किसी को होता है, और यह आपको भी है तभी आप यह ब्लाग पढ़ रहे हैं। लेकिन बहुत ऐसे लोग हैं जो इसलिए घूमने जाना पसंद नहीं करते क्योंकि एक बार का अनुभव उन्हें हर बार डराता है। ऐसे डर से बचने के लिए जरूरी है कि आप घूमने जाने के लिए पहले जरूरी तैयारी कर ले ताकि घूमने के दौरान कोई तनाव न रहे। खासकर सफर के दौरान खानपान परध्यान देने की जरूरत है। ऐसे ही उपायें के बारे में जानकारी देता यह आलेख
आप घूमने फिरने के शौकीन हैं। जब भी आपका मन करता है, अपने परिवार के साथ छुट्टियां मनाने खूबसूरत जगह पर निकल जाते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है कि थोड़ी सी लापरवाही यात्रा का मजा किरकिरा कर देती है। खानपान के कारण किसी की तबियत खराब हो जाती है। ऐसे में थोड़ी सी सावधानी बरतकर आप अपनी यात्रा को यादगार बना सकते हैं।

पैकिंग ही नहीं, खानें का भी रखें ख्याल

आप अकेले या फिर अपने परिवार के साथ घूमने जाते समय इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि आपकी पैकिंग सही तरीके से हो। आपके पास जरूरत का सारा सामान हो। सफर के दौरान अपनी खानपान की अनदेखी भारी पड़ सकती है। यह सच है कि आप जिस जगह घूमने जाते हैं, वहां के व्यंजन आपको लुभाते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर घूमते समय खाने पीने का ध्यान न रखा जाय तो तबियत खराब हो सकती है। इसलिए सफर के दौरान खाने पीने संबंधी बातों का खासतौर पर ध्यान रखें।

साथ में रखें खानें का सामान 

घूमने जाने का कतई मतलब नहीं है कि आपको बाहर खाने की छूट मिल गयी है। होटल या रेस्टोरेंट का खाना भले ही स्वादिष्ट लगता है, लेकिन सेहत के इलाज से इसका ज्यादा सेवन ठीक नहीं है। इस स्थिति से बचने के लिए घूमने जाते समय साथ में भरपूर मात्रा में खाने-पीने की वस्तुएं रखें।

पानी की बोतल हो साथ में 

जब भी आप घूमने के लिए जाएं तो अपने साथ में पानी को बोतल रखें। जब भी प्यास लगे तो सोडा या कोल्ड ड्रिंक का सेवन करने की बजाय पानी पिएं, जिससे आपके शरीर में पानी की कमी ना हो।

खाएं फल और सब्जियां 

ज्ब आप घूमने जाते हैं तो अपने खाने में फलों और सब्जियों को दरकिनार कर देते हैं। इससे आपका खाना भारी हो जाता है। सब्जियों और सलाद से आपको भररपूर पोषण मिलेगा, लेकिन इससे आपको भारीपन महसूस नहीं होगा।

चाय - काफी का सेवन करें कम से कम

 अगर आपको हर घंटे चाय या काफी पीने की आदत है तो सफर के दौरान अपनी इस आदत पर विराम लगाएं। इस समय जितना हो सके चीनी वाली चाय या काफी से दूर ही रहें। काफी का सेवन करने से आपको अपने शरीर में नमी की कमी होने के साथ-साथ थोड़ी देर में थकान भी महसूस होने लगेगी।

नाश्ता हो हल्का 

सुबह का नाश्ता हल्का ही रखें। नाश्तें में भारी चीजे मसलन छोले- भठूरे, कचैड़ी, पकौड़ी आदि ना शामिल करें।

Saturday, January 26, 2019

कैलाश - मानसरोवर तीर्थयात्री को एक लाख की सहायता

प्रतीकात्मक तस्वीर (सभार: गूगल सर्च)
 झारखंड के वैसे लोगों के लिए एक अच्छी खबर है जो कैलाश - मानसरोवर यात्रा की योजना बना रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शिव धाम कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को झारखंड सरकार एक लाख रूप्ये का प्रोत्साहन राशि देगी। यह राशि कैलाश और मानसरोवर दोनों की यात्रा करने वाले को दिया जायेगा। दोनों जगहों की यात्रा अगर नहीं होती है तो इसका लाभ नहीं मिल सकेगा। इससे पहले यूपी की सरकार ने इस योजना को शुरू किया था जिसके बाद झारखंड में इसे लागू किया गया है। यात्रा रकने वालों का आवेदन भी लिया जा रहा है। इसके लिए यात्रा करने का प्रमाण, पासपोर्ट, आधार या आई कार्ड पर्यटन विभाग को देना होगा। सरकार ने इसकी जिम्मेवारी पर्यटन विभाग को सौंपी है।

अब तक पहुंच चुका है 100 आवेदन

पर्यटन विभाग के पास सूबे से अभी तक एक सौ आवेदन पहुंचे हैं। इसमें राजधानी से सबसे ज्यादा आवेदन आए है। पर्यटन निदेशालय के आलोक प्रसाद बताते हें कि सभी आवेदनों की स्क्रूटनी होगी, उसके बाद इसकी सारी रिपोर्ट सरकार को भेज दी जायेगी। अभी सरकार की ओर से कोई फंड नहीं दिया गया है। स्क्रूटनी की रिपोर्ट के बाद सरकार फंड देगी, जिसे चेक के माध्यम से लाभुकों को दिया जायेगा। उन्होंने बताया कि लाभ लेने के लिए हर बाताों को पहले ही बताया गया है। इसे बाद भी  अधूरी यात्रा की आवेदन आता है तो राशि नहीं दी जायेगी।

कठिन यात्रा होने के कारण दी जा रही राशि
कैलाश - मानसरोवर की यात्रा कठिन होने के कारण  सरकार यह प्रोत्साहन राशि दे रही है। यात्रा में सिक्किम या नेपाल होकर चीन की सरहद  पार करनी होती है। सरहद पार करने के बाद दस से पंद्रह दिनों में यात्रा पूरी होती है। श्रद्वालुओं की श्रद्वा व उनकी भावना को देखते हुए यह योजना बनायी गयी है।


Tuesday, January 22, 2019

पौष पूर्णिमा : समाधिस्थल पर उमड़ा भक्तों का सैलाब

समाधिस्थल
तय कार्यक्रम के तहत सर्द सुबह लंगटा बाबा की समाधिस्थल के लिए तैयार हुआ। सुबह 6 बजे बाइक स्टार्ट किया और चल दिया अपने गंतव्य की ओर, लेकिन दस किलोमीटर चलने के बाद ही इस बात का अहसास हो गया कि इस कंपकांपाती मौसम में बाइक चलाना भी इतना आसान काम नहीं है। जैसे ही बाइक अपनी गति पकड़ती ठंढी हवा शरीर में चूभने लगती। तीस किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद कुछ देर भगवान भास्कर की प्रतिक्षा में खड़ा रहा ताकि धूप निकलने के बाद कुछ राहत मिले लेकिन ऐसा होना नहीं था सो नहीं हुआ। वहां से बिना कहीं रूके एक सौ किलोमीटर की दूरी नाप ली।
 नौ बजे मैं जमुआ चैक पहुंच चुका था। जमुआ चैक से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर समाधिस्थल से है। यही से चादरपोशी को ले चहलपहल देखी जा रही थी। न केवल झारखंड राज्य के विभिन्न जिलों से बल्कि अन्य राज्यों से भी बाबा भक्तों का जत्था समाधि की ओर पूरे श्रद्धा भाव से जा रहा था। जमुआ से निकलते ही भारी भीड़ मिलने लगी, धीरे - धीरे आगे बढ़ते हुए मैं खरगडीहा पहुंच गया। खरगडीहा स्थित मुख्य मार्ग में जबर्दस्त भीड़ थी। भक्तों की सुविधा के लिए समाधि स्थल से एक किलोमीटर पहले से ही जमुआ - देवघर मुख्य पथ पर दोनों और बैरियर लगाकर वाहनों का आवगमन रोक दिया गया था। नयी जगह पर पहुंचकर भीड़ का आकलन करना एक कठिन काम है। वैसे यहां कोई ऐसा कार्यालय आदि भी नहीं मिला जिससे भीड़ के बारे में ठीक ठाक अंदाजा मिल जाय लिहाजा मैं भीड़ से संबंधित कोई आंकड़ा  नहीं दे रहा हूं।
समाधिस्थल के अंदर का नजारा भी बाहर जैसा ही था, जहां भक्तों की भीड़ अपने - अपने हाथों में चादर लेकर चादरपोशी करने को ले अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। भीड़ ऐसी कि सरकना पड़ रहा था। पहुंचते ही बताया गया कि चादरपोशी का सिलसिला सुबह तीन बजे से ही शुरू हो गया था। समााधि में सबसे पहले चादरपोशी स्थानीय थाना के थाना प्रभारी ने की। उसके बाद  भक्तजनों के लिए दरवाजा खोल दिया गया। भारी भीड़ होने के कारण भीड़ को अनियंत्रित होते भी देखा गया। लेकिन प्रशासन की सतर्कता और इंतजाम की वजह से शीघ्र नियंत्रित कर लिया जाता रहा। महिला और पुरूष के लिए अलग अलग प्रवेश द्वार और निकासी की व्यवस्था की गयी थी।
                                                 लंगटा बाबा समाधि दिवस के अवसर पर विभिन्न जगहों से साधु और फकीर भी पहुंचे। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी इनलोगों के लिए यहां धूनी रमाने और खान पान की माकूल व्यवस्था की गयी थी। बाबा को माननेवाले हजारों संतों का भी यहां मेला लगा रहा। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी विभिन्न स्वयं सेवी संगठनों द्वारा निःशुल्क चाय, बिस्कुट आदि की व्यवस्था की गयी थी।
 


Saturday, January 19, 2019

पौष पूर्णिमा में यहां चादरपोशी करने उमड़ती है भक्तो की भीड़


खरगडीहा स्थित लंगटा बाबा समाधिस्थल में पौष पूर्णिमा को ले की जा रही तैयारी अंतिम चरण में है। पौष पूर्णिमा के अवसर पर विभिन्न धर्मावलंबियों द्वारा चादरपोशी की जाएगी। यह एक ऐसा स्थल है जहां हर समुदाय के लोग पूरी श्रद्वा व आस्था से मत्था टेकने पहुंचते है। समाधि स्थल और आसपास के स्थलों की साफ सफाई कर मेला के लिए तैयार कर लिया गया है वहीं जगह जगह तोरण द्वार बनाए गए हैं। हरबर्ष पौष पूर्णिमा के अवसर पर यहां मेला लगता है। विभिन्न राज्यों के श्रद्धालु चादर पोशी करने यहां पहुंचते हैं।

धर्मनिरपेक्षता की जीवंत मिसाल है लंगटा बाबा का समाधिस्थल

झारखंड के गिरिडीह जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर जमुआ - देवघर पथ पर उसरी नदी किनारे स्थित खरगडीहा गांव में उनकी समाधि है। पौष पूर्णिमा पर यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई सभी धर्मावलंबी बड़े ही श्रद्धा से सजदा करने आते हैं। बताया जाता है कि 1870 के दशक में नागा साधुओं की एक टोली के साथ वे यहां पहुंचे थे। उस वक्त खरगडीहा परगना हुआ करता था। कुछ दिन के पड़ाव के बाद नागा साधुओं की टोली अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गयी लेकिन एक साधु यही रह गए जो बाद में लंगटा बाबा के नाम से विख्यात हुए।

किस पंथ के थे बाबा
कहते हैं कि संतों की कोई पंथ परंपरा नहीं होती। लंगटा बाबा भी किसी खास संप्रदाय या परंपरा से नहीं है वे प्राणी मात्र के लिए है। उनके मन में मानव के साथ साथ पशु पक्षियों के प्रति भी अगाध प्रेम था। लंगटा बाबा ने 25 जनवरी 1910 में महासमाधि ली थी।
समाधिस्थल पर उमड़ी भीड़ (फाइल फोटो)


पौष पूर्णिमा ही क्यों
बर्ष 1910 में पौष पूर्णिमा के दिन जब  लंगटा बाबा ने अपने भौतिक देह का त्याग किया तो उस वक्त क्षेत्र के हिंदू एवं मुसलमानों को ऐसा  लग रहा था कि उनका सबकुछ लूट गया। बाबा के शरीर के अंतिम संस्कार के लिए भी दोनों समुदाय के लोग आपस में उलझ पड़े थे। बताते हैं कि तब क्षेत्र के प्रबुद्ध लोगों ने विचार- विमर्श के बाद दोनों धर्म के रीति - रिवाज से अंतिम संस्कार किया था। उसके बाद से प्रत्येक बर्ष पौष पूर्णिमा के दिन यहां मेला लगता है। मेला में उमड़ने वाली भीड़ यह स्पष्ट संकेत देती है कि पीड़ित मानवता की रक्षा करनेवाले संत आज भी आमजनों के दिल में जीवित हैं। पौष पूर्णिमा यानि बाबा के समाधि दिवस पर यहां विशाल भंडारे का आयोजन होता है। जिसमें दूर -दराज से आये भिखारी, फकीर एवं भक्तों  के बीच देशी घी से बनी पुड़ी - सब्जी व हलवा को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

 पौष पूर्णिमा यानि 21 जनवरी को मैनें भी बाबा की समाधिस्थल जाने की योजना बनाई है। यह मेरी बाइक यात्रा होगी और इस यात्रा व समाधिस्थल का विवरण भी आपसे साझा करूंगा।

Friday, January 18, 2019

मधुबन : मकर संक्रांति मेला का अनुपम अनुभव

पर्वत स्थित पार्श्वनाथ टोंक पर उमड़ी भीड़
12 जनवरी को 'यहां होता है मकर संक्रांति का बेसब्री से इंतजार' शीर्षक वाले एक पोस्ट से झारखंड के गिरिडीह में मकर संक्रांति मेला के बारे में जानाकारी दी थी। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत सुबह सात बजे मधुबन पहुंच गया। प्रस्तुत है 15 जनवरी को मेला के अनुभव का विवरण -

                   मधुबन से 15 किलोमीटर पहले ही मेला का आभास होने लगा था। वाहनों की कतार मेला मधुबन की ही ओर जा रही थी वहीं कुछ लोग बाइक से भी जा रहे थे। आलम यह कि उत्साहवश यातायात नियमों को ताक पर रखते हुए एक ही बाइक में तीन लोग सवार होकर जा रहे थे। वहीं चारपहिया वाहनों में छत पर बैठ कर यात्रा का आंनद लेते लोग देखे गए। गिरिडीह - डुमरी मुख्य मार्ग स्थित मधुबन मोड़ से मधुबन का अलग रास्ता है और यहां से मधुबन की दूरी महज चार किलोमीटर है। मोड़ से अंदर दो किलोमीटर का फासला तय करते ही मुझे एक बैरियर मिला जहां चारपहिया वाहनों को पार्किंग स्थल की ओर मोड़ दिया जा रहा था। यहां से बड़े वाहनों को आगे जाने की अनुमति नहीं थी। मैं बाइक से जा रहा था लिहाजा कुछ दूर आगे बढ़ा तो एक और बैरियर मिला जहां बाइक के लिए पार्किंग की जगह बनायी गयी थी। इस जगह से किसी भी तरह का वाहन आगे नहीं जा सकता था।
बाइक पार्किंग स्थल 

मैं भी अपनी बाइक पार्किंग कर आगे बढ़ गया। बिरनगड्डा मैदान उतरते ही वहां का नजारा उम्मीद से हटकर था। सामने जर्बदस्त भीड़ थी मानो मानव समुद्र हिलोरं मार रहा हो। पैर रखने तक की जगह नहीं थी। और पीछे से दर्शनार्थियों की भारी भीड़ उमड़ती जा रही थी। मैदान में तरह तरह की दुकानें सजी थी, कुछ मिठाई की, कुछ खिलौनों की तो कुछ अन्य सामग्रियों की। न केवल कई तरह की दुकानें थी बल्कि किस्म किस्म के झूले भी थे। इस समय सुबह के सात बज रहे थे और किसी भी व्यक्ति का ध्यान इन दुकानों पर नहीं था। सभी आगे बढ़ रहे थे। मै भी भीड़ के साथ ही आगे बढ़ रहा था। लगभग 20 मिनट बाद मैं पर्वत की तलहटी पर खड़ा था। यही वह जगह है जहां से पारसनाथ पहाड़ की चढ़ाई शुरू होती है।
                               चूंकि यह जगह मेरे लिए नई नहीं थी, कई बार पर्वत यात्रा भी कर चुका हूं। बावजूद इस खास अवसर का अनुभव लेने के उद्वेश्य से भीड़ का हिस्सा बना रहा। मेरे कदम भी पर्वत की चोटी की तरफ तेजी से बढ़ने लगे। लगभग आधे घंटे बाद मैं पर्वत स्थित भाता घर पहुंच चुका था। यह स्थल गंधर्व नाला के किनारे स्थित है, यहां कुछ दुकानें हैं जहां पर्वत वंदना करने को ले चढ़ रहे लोग थोड़ा आराम करते है। यहां से चलने के करीब आधा धंटा बाद इस बार मैं सीतानाला पहुंचा। यहां पर रूका नहीं अैर चलता रहा। लगभग 45 मिनट बाद चैपड़ाकुंड पहुंच चुका था। यहां तक मैं अपनी गति से चल रहा था। लेकिन यहां के बाद अपार भीड़ के कारण चलने की बात तो दूर सरकना भी मुश्किल हो गया था। न तो किसी मंदिर में प्रवेश कर पाना संभव था और न ही एक जगह खड़ा हो पाना आसान था। एकबार तो मुझे भी लगा कि बेकार ही इस भीड़ में कूद गया। और फिर तत्काल निर्णय ले लिया कि किसी भी टोंक या मंदिर में अंदर गए बगैर वापस लौट जाउंगा। और ठीक वैसा ही किया। गौतमस्वामी टोंक पहुंचा वहां से फिर पाश्र्वनाथ मंदिर के रास्ते से डाकबंगला होते हुए वापस नीचे उतर गया। उतरने में जहां दो घंटे का समय लगता है वहीं मुझे चार घंटे लग गए। दुकानों में भी भारी भीड़ थी। काफी देर की प्रतीक्षा के बाद पानी की बोतल खरीद सका।
मधुबन में उमड़ी भीड़

पर्वत से नीचे उतरने के बाद मधुबन का नजारा भी कुछ ऐसा ही था। मधुबन के मंदिरों में भारी भीड़ थी जिधर नजर धुमती लोगों के सर ही दिखाई दे रहे थे। मुख्य सड़क पर एक - एक कदम बढ़ाना मुश्किल सा हो रहा था। बावजूद मेला दर्शनार्थियों का उत्साह व उमंग देखते ही बन रहा था। वहीं सड़क किनारे - किनारे दर्जनों दुकानें लगी थी। लोग न केवल मंदिरों की सुंदरता व भव्यता को निहार रहे थे बल्कि जमकर खरीददारी भी कर रहे थे।
दोपहर के तीन बज रहे थे।
मेला परिसर का दृश्य 

 मैं पुनः बिरनगड्डा के मैदान में था। इस समय यहां भीड़ अपनी चरम स्थिति में थी। दुकानदारी के साथ - साथ झूला का भी लुत्फ उठा रहे थे। इस मेला मैदान का एक चक्कर लगाने के बाद में मकर संक्रांति मेला समिति का कार्यालय भी गया जहां से मेला का संचालन हो रहा था। उसके बाद पार्किंग स्थल गया जहां मेरी बाइक सुरक्षित खड़ी थी।
मेला समिति का अस्थायी कार्यालय

बता दूं कि यहां मकर संक्राति के अवसर पर मेला का आयोजन होता है। प्रतिवर्ष मकर संक्राति के अवसर पर झारखंड के विभिन्न जगहों से लोग मेला देखने पहुंचते है। एक अनुमान के मुताबिक इस वर्ष लगभग डेढ़ लाख की भीड़ मेला देखने पहुंची थी। यूं तो यह स्थल जैन धर्मावलंबियों का प्रसिद्व तीर्थस्थल है जहां 24 में से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया है। यही वजह है कि सालोंभर जैन श्रद्वालु यहां पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात मकर संक्रांति मेला समिति के सदस्यों की सकियता थी। हरेक सदस्य इस बात का ध्यान रख रहे थे कि किसी भी दर्शनार्थी को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। वहीं प्रशासन द्वारा भी ऐंबुलेंस, मेला के दौरान पुलिस जवान हरेक गतिविधि पर नजर बनाए्र हुए थे ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना न हो। इसके अलावा मेला में गुम हो चुके लोगों को उनके परिजनों से भी मिलाया गया। जो भी हो, एकदिवसीय मेला में हजारों की भीड़ तथा हरेक व्यक्ति के चेहरे में मेला को उत्साह व उमंग का भाव देखना अद्वितिय अनुभव था।

मधुबन की दूरी झारखंड की राजधानी रांची से दो सौ किलोमीटर है। बस द्वारा रामगढ, हजारीबाग होते हुए यहां आने में चार घंटे का समय लगता है। पारसनाथ स्टेशन (21 किलोमीटर) व गिरिडीह स्टेशन (32 किलोमीटर) निकटतम स्टशेन है।
 



Saturday, January 12, 2019

यहां होता है मकर संक्रांति का बेसब्री से इंतजार

लगाया जा रहा झूला

 मकर संक्राति नियमित अंतराल पर होने वाली एक खगोलीय घटना है। इस दौरान सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते ही उत्तरायण हो जाते हैं। झारखंड में इस दिन का बेसब्री से इंतजार होता है, कई जगह इस अवसर पर खिचडी मेला का आयोजन किया जाता है। आज मैं झारखंड के गिरिडीह में हो रहे खिचड़ी मेला की तैयारी का विवरण साझा कर रहा हूं वहीं 15 जनवरी को मेला को ले माहौल व अनुभव  भी पोस्ट करूंगा। 


झारखंड के सर्वोच्च पर्वत होने का गौरव प्राप्त पारसनाथ पर्वत की हसीन वादियों में बसा मधुबन खुद को मकर संक्रांति मेला की तैयारी में लगा दिया है। आसपास के क्षेत्रों में मेला की चर्चा तेज हो गयी है। कई ऐसे लोग हैं जो संक्राति के अवसर पर मधुबन, पारसनाथ जाने की योजना बना रहे हैं। कुछ 14 जनवरी को ही मधुबन पहुंच जाऐंगे तो कुछ 15 जनवरी को अहले सुबह पारसनाथ के लिए रवाना होंगे। योजानाएं भी दूरी के आधार पर बनरयी जा रही है। वहीं मधुबन में मेला को ले तरह तरह के झूले लगाये गये हैं। किसी भी सैलानी को किसी भी प्रकार की समस्या न हो इसके लिए समिति द्वारा जर्बदस्त तैयारी की गयी है। प्रतिवर्श मकर संक्राति के अवसर पर एक लाख सैलानी मेला का लुत्फ उठाने यहां पहुंचते है। लगभग दो सौ किलोमीटर के दायरे से लोग यहां मेला देखने पहुंचते हैं।

कब से हो रहा है मेला का आयोजन 

गिरिडीह जिला के पीरटांड प्रखंड स्थित मधुबन में कब से मेला लग रहा है इसका ठीक ठीक विवरण किसी के पास नहीं है। अधिकांश लोगों ने बताया कि जब से उन्होंने होश संभाला है मकर संक्राति के अवसर पर यहां मेला लगते हुए देखा है। आज से तीस वर्ष पहले मेला का दायरा काफी सिमटा हुआ था। पर बदलते समय का साथ मेला ने भी अपना रूप बदला है और इसी क्रम में इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि अब मेला देखने आने वालों की संख्या का आंकड़ा एक लाख छूने लगा है। मेला के दिन न केवल मेला मैदान व मधुबन का मुख्य मार्ग बल्कि पारसनाथ पर्वत का नजारा भी पूरी तरह से बदल जाता है। कहीं पैर रखने की जगह नहीं मिलने लगती है।

पिछले 10 वर्षों से मेला का कमान संभाल रही है समिति

आज से 10 वर्ष पहले मेला का आयोजन आज की तरह व्यवस्थित और वृहत नहीं होता था। सैलानियों की परेशानी को देखते हुए आसपास के 20 गांवों के ग्रामीणों ने वर्ष 2010 के नवंबर माह में मकर संक्राति मेला समिति का गठन किया। समिति ने पूरी मुस्तैदी के साथ मेला का संचालन करना शुरू कर दिया। दर्जनाधिक सदस्यों की बेहतर रणनीति व कड़ी मेहनत ने मेला का रूप बदल दिया। यही वजह है कि मेला आनेवालों की संख्या सैकड़ों से हजारों में रूपांतरित हो गयी। मेला को ले बैठकों का दौर महीनों पहले शुरू हो जाता है। छोटी सी छोटी चीजों को भी ध्यान में रखकर तैयारी की जाती है। बात चाहे वाहन पार्किंग की हो, पूछताछ कार्यालय की हो या फिर सैलानियों की सहायता से संबंधित, हर तरह की सुविधा मुहैया कराने की कोशिश की जाती है।
    
                                     बिरनगड्डा के मैदान में मेला का आयोजन किया जाता है। इस मेला में तरह तरह के झूले लगाये जाते हैं। इस बार भी झूला आदि  लगाया जा रहा है। वहीं कई तरह की दुकानें भी सज जाती है। मेला के पहले ही पार्किंग की व्यवस्था की जाती है ताकि यहां आने वाले लोग अपने वाहन पार्क कर निंश्चिंत होकर मेला का आनंद उठा सके। कुछ लोग मेला का आंनद उठाते हैं, कुछ मधुबन स्थित जैन मंदिरों की भव्यता व सुंदरता को निहारते हैं तो कोई पर्वत यात्रा शुरू कर देते हैं। पर्वत की प्राकृतिक सुंदरता सहज ही लोगों को अपनी और आकर्षित कर लेती है। मुख्य रूप से 15 जनवरी को भारी भीड़ उमड़ती है, झारखंड में यह मेला ‘खिचड़ी मेला‘ के नाम से भी जाना जाता है।

झारखंडी संस्कृति की झलक है यह मेला: आचार्य
मधुबन में आयोजित होने वाले मकर संक्राति मेला में हमे झारखंडी संस्कृति की झलक मिल जाती है। अलग अलग समुदाय से लोग प्रकृति की सुंदरता को निहारने यहां पहुंचते है। यहां पहुंचते ही सभी एक रंग में रंग जाते हैं। संका्रति एक नियमित रूप से होने वाली खगोलीय घटना है। यू ंतो एक वर्श में 12 संका्रंति होती है यानि हर महीने संक्राति होती है पर मकर संका्रंति का अलग महत्व है। झारखंड का मुख्य फसल धान है और इस समय लोग अपनी फसलों को घर लाकर कृषि कार्यों से निवृत हो जाते हैं। उक्त बातें मधुबन में रह रहे आचार्य सुयश सूरी जी महाराज ने कही। मैनंे आचार्य श्री से इसलिए उनका विचार लिया क्योंकि इनका जन्म बोकारो जिला के पर्वतपुर में हुआ है। इन्होंने जैन दर्शन, संस्कृत व ज्योतिष का गहन अध्ययन करने के साथ -साथ झारखंड का भ्रमण करते हुए यहां होने वाले विभिन्न आयोजनों को काफी करीब से समझने की कोशिश की है। मधुबन मकर संका्रति मेला को ले कहते हैं कि बदलते समय के साथ काफी सकारात्मक परिर्वतन हुआ है।