Friday, January 18, 2019

मधुबन: मकर संक्रांति मेला का अनुपम अनुभव

पर्वत स्थित पार्श्वनाथ टोंक पर उमड़ी भीड़
12 जनवरी को 'यहां होता है मकर संक्रांति का बेसब्री से इंतजार' शीर्षक वाले एक पोस्ट से झारखंड के गिरिडीह में मकर संक्रांति मेला के बारे में जानाकारी दी थी। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत सुबह सात बजे मधुबन पहुंच गया। प्रस्तुत है 15 जनवरी को मेला के अनुभव का विवरण -

                   मधुबन से 15 किलोमीटर पहले ही मेला का आभास होने लगा था। वाहनों की कतार मेला मधुबन की ही ओर जा रही थी वहीं कुछ लोग बाइक से भी जा रहे थे। आलम यह कि उत्साहवश यातायात नियमों को ताक पर रखते हुए एक ही बाइक में तीन लोग सवार होकर जा रहे थे। वहीं चारपहिया वाहनों में छत पर बैठ कर यात्रा का आंनद लेते लोग देखे गए। गिरिडीह - डुमरी मुख्य मार्ग स्थित मधुबन मोड़ से मधुबन का अलग रास्ता है और यहां से मधुबन की दूरी महज चार किलोमीटर है। मोड़ से अंदर दो किलोमीटर का फासला तय करते ही मुझे एक बैरियर मिला जहां चारपहिया वाहनों को पार्किंग स्थल की ओर मोड़ दिया जा रहा था। यहां से बड़े वाहनों को आगे जाने की अनुमति नहीं थी। मैं बाइक से जा रहा था लिहाजा कुछ दूर आगे बढ़ा तो एक और बैरियर मिला जहां बाइक के लिए पार्किंग की जगह बनायी गयी थी। इस जगह से किसी भी तरह का वाहन आगे नहीं जा सकता था।
बाइक पार्किंग स्थल 

मैं भी अपनी बाइक पार्किंग कर आगे बढ़ गया। बिरनगड्डा मैदान उतरते ही वहां का नजारा उम्मीद से हटकर था। सामने जर्बदस्त भीड़ थी मानो मानव समुद्र हिलोरं मार रहा हो। पैर रखने तक की जगह नहीं थी। और पीछे से दर्शनार्थियों की भारी भीड़ उमड़ती जा रही थी। मैदान में तरह तरह की दुकानें सजी थी, कुछ मिठाई की, कुछ खिलौनों की तो कुछ अन्य सामग्रियों की। न केवल कई तरह की दुकानें थी बल्कि किस्म किस्म के झूले भी थे। इस समय सुबह के सात बज रहे थे और किसी भी व्यक्ति का ध्यान इन दुकानों पर नहीं था। सभी आगे बढ़ रहे थे। मै भी भीड़ के साथ ही आगे बढ़ रहा था। लगभग 20 मिनट बाद मैं पर्वत की तलहटी पर खड़ा था। यही वह जगह है जहां से पारसनाथ पहाड़ की चढ़ाई शुरू होती है।
                               चूंकि यह जगह मेरे लिए नई नहीं थी, कई बार पर्वत यात्रा भी कर चुका हूं। बावजूद इस खास अवसर का अनुभव लेने के उद्वेश्य से भीड़ का हिस्सा बना रहा। मेरे कदम भी पर्वत की चोटी की तरफ तेजी से बढ़ने लगे। लगभग आधे घंटे बाद मैं पर्वत स्थित भाता घर पहुंच चुका था। यह स्थल गंधर्व नाला के किनारे स्थित है, यहां कुछ दुकानें हैं जहां पर्वत वंदना करने को ले चढ़ रहे लोग थोड़ा आराम करते है। यहां से चलने के करीब आधा धंटा बाद इस बार मैं सीतानाला पहुंचा। यहां पर रूका नहीं अैर चलता रहा। लगभग 45 मिनट बाद चैपड़ाकुंड पहुंच चुका था। यहां तक मैं अपनी गति से चल रहा था। लेकिन यहां के बाद अपार भीड़ के कारण चलने की बात तो दूर सरकना भी मुश्किल हो गया था। न तो किसी मंदिर में प्रवेश कर पाना संभव था और न ही एक जगह खड़ा हो पाना आसान था। एकबार तो मुझे भी लगा कि बेकार ही इस भीड़ में कूद गया। और फिर तत्काल निर्णय ले लिया कि किसी भी टोंक या मंदिर में अंदर गए बगैर वापस लौट जाउंगा। और ठीक वैसा ही किया। गौतमस्वामी टोंक पहुंचा वहां से फिर पाश्र्वनाथ मंदिर के रास्ते से डाकबंगला होते हुए वापस नीचे उतर गया। उतरने में जहां दो घंटे का समय लगता है वहीं मुझे चार घंटे लग गए। दुकानों में भी भारी भीड़ थी। काफी देर की प्रतीक्षा के बाद पानी की बोतल खरीद सका।
मधुबन में उमड़ी भीड़

पर्वत से नीचे उतरने के बाद मधुबन का नजारा भी कुछ ऐसा ही था। मधुबन के मंदिरों में भारी भीड़ थी जिधर नजर धुमती लोगों के सर ही दिखाई दे रहे थे। मुख्य सड़क पर एक - एक कदम बढ़ाना मुश्किल सा हो रहा था। बावजूद मेला दर्शनार्थियों का उत्साह व उमंग देखते ही बन रहा था। वहीं सड़क किनारे - किनारे दर्जनों दुकानें लगी थी। लोग न केवल मंदिरों की सुंदरता व भव्यता को निहार रहे थे बल्कि जमकर खरीददारी भी कर रहे थे।
दोपहर के तीन बज रहे थे।
मेला परिसर का दृश्य 

 मैं पुनः बिरनगड्डा के मैदान में था। इस समय यहां भीड़ अपनी चरम स्थिति में थी। दुकानदारी के साथ - साथ झूला का भी लुत्फ उठा रहे थे। इस मेला मैदान का एक चक्कर लगाने के बाद में मकर संक्रांति मेला समिति का कार्यालय भी गया जहां से मेला का संचालन हो रहा था। उसके बाद पार्किंग स्थल गया जहां मेरी बाइक सुरक्षित खड़ी थी।
मेला समिति का अस्थायी कार्यालय

बता दूं कि यहां मकर संक्राति के अवसर पर मेला का आयोजन होता है। प्रतिवर्ष मकर संक्राति के अवसर पर झारखंड के विभिन्न जगहों से लोग मेला देखने पहुंचते है। एक अनुमान के मुताबिक इस वर्ष लगभग डेढ़ लाख की भीड़ मेला देखने पहुंची थी। यूं तो यह स्थल जैन धर्मावलंबियों का प्रसिद्व तीर्थस्थल है जहां 24 में से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया है। यही वजह है कि सालोंभर जैन श्रद्वालु यहां पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात मकर संक्रांति मेला समिति के सदस्यों की सकियता थी। हरेक सदस्य इस बात का ध्यान रख रहे थे कि किसी भी दर्शनार्थी को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। वहीं प्रशासन द्वारा भी ऐंबुलेंस, मेला के दौरान पुलिस जवान हरेक गतिविधि पर नजर बनाए्र हुए थे ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना न हो। इसके अलावा मेला में गुम हो चुके लोगों को उनके परिजनों से भी मिलाया गया। जो भी हो, एकदिवसीय मेला में हजारों की भीड़ तथा हरेक व्यक्ति के चेहरे में मेला को उत्साह व उमंग का भाव देखना अद्वितिय अनुभव था।

मधुबन की दूरी झारखंड की राजधानी रांची से दो सौ किलोमीटर है। बस द्वारा रामगढ, हजारीबाग होते हुए यहां आने में चार घंटे का समय लगता है। पारसनाथ स्टेशन (21 किलोमीटर) व गिरिडीह स्टेशन (32 किलोमीटर) निकटतम स्टशेन है।
 



Saturday, January 12, 2019

यहां होता है मकर संक्रांति का बेसब्री से इंतजार

लगाया जा रहा झूला

 मकर संक्राति नियमित अंतराल पर होने वाली एक खगोलीय घटना है। इस दौरान सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते ही उत्तरायण हो जाते हैं। झारखंड में इस दिन का बेसब्री से इंतजार होता है, कई जगह इस अवसर पर खिचडी मेला का आयोजन किया जाता है। आज मैं झारखंड के गिरिडीह में हो रहे खिचड़ी मेला की तैयारी का विवरण साझा कर रहा हूं वहीं 15 जनवरी को मेला को ले माहौल व अनुभव  भी पोस्ट करूंगा। 


झारखंड के सर्वोच्च पर्वत होने का गौरव प्राप्त पारसनाथ पर्वत की हसीन वादियों में बसा मधुबन खुद को मकर संक्रांति मेला की तैयारी में लगा दिया है। आसपास के क्षेत्रों में मेला की चर्चा तेज हो गयी है। कई ऐसे लोग हैं जो संक्राति के अवसर पर मधुबन, पारसनाथ जाने की योजना बना रहे हैं। कुछ 14 जनवरी को ही मधुबन पहुंच जाऐंगे तो कुछ 15 जनवरी को अहले सुबह पारसनाथ के लिए रवाना होंगे। योजानाएं भी दूरी के आधार पर बनरयी जा रही है। वहीं मधुबन में मेला को ले तरह तरह के झूले लगाये गये हैं। किसी भी सैलानी को किसी भी प्रकार की समस्या न हो इसके लिए समिति द्वारा जर्बदस्त तैयारी की गयी है। प्रतिवर्श मकर संक्राति के अवसर पर एक लाख सैलानी मेला का लुत्फ उठाने यहां पहुंचते है। लगभग दो सौ किलोमीटर के दायरे से लोग यहां मेला देखने पहुंचते हैं।

कब से हो रहा है मेला का आयोजन 

गिरिडीह जिला के पीरटांड प्रखंड स्थित मधुबन में कब से मेला लग रहा है इसका ठीक ठीक विवरण किसी के पास नहीं है। अधिकांश लोगों ने बताया कि जब से उन्होंने होश संभाला है मकर संक्राति के अवसर पर यहां मेला लगते हुए देखा है। आज से तीस वर्ष पहले मेला का दायरा काफी सिमटा हुआ था। पर बदलते समय का साथ मेला ने भी अपना रूप बदला है और इसी क्रम में इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि अब मेला देखने आने वालों की संख्या का आंकड़ा एक लाख छूने लगा है। मेला के दिन न केवल मेला मैदान व मधुबन का मुख्य मार्ग बल्कि पारसनाथ पर्वत का नजारा भी पूरी तरह से बदल जाता है। कहीं पैर रखने की जगह नहीं मिलने लगती है।

पिछले 10 वर्षों से मेला का कमान संभाल रही है समिति

आज से 10 वर्ष पहले मेला का आयोजन आज की तरह व्यवस्थित और वृहत नहीं होता था। सैलानियों की परेशानी को देखते हुए आसपास के 20 गांवों के ग्रामीणों ने वर्ष 2010 के नवंबर माह में मकर संक्राति मेला समिति का गठन किया। समिति ने पूरी मुस्तैदी के साथ मेला का संचालन करना शुरू कर दिया। दर्जनाधिक सदस्यों की बेहतर रणनीति व कड़ी मेहनत ने मेला का रूप बदल दिया। यही वजह है कि मेला आनेवालों की संख्या सैकड़ों से हजारों में रूपांतरित हो गयी। मेला को ले बैठकों का दौर महीनों पहले शुरू हो जाता है। छोटी सी छोटी चीजों को भी ध्यान में रखकर तैयारी की जाती है। बात चाहे वाहन पार्किंग की हो, पूछताछ कार्यालय की हो या फिर सैलानियों की सहायता से संबंधित, हर तरह की सुविधा मुहैया कराने की कोशिश की जाती है।
    
                                     बिरनगड्डा के मैदान में मेला का आयोजन किया जाता है। इस मेला में तरह तरह के झूले लगाये जाते हैं। इस बार भी झूला आदि  लगाया जा रहा है। वहीं कई तरह की दुकानें भी सज जाती है। मेला के पहले ही पार्किंग की व्यवस्था की जाती है ताकि यहां आने वाले लोग अपने वाहन पार्क कर निंश्चिंत होकर मेला का आनंद उठा सके। कुछ लोग मेला का आंनद उठाते हैं, कुछ मधुबन स्थित जैन मंदिरों की भव्यता व सुंदरता को निहारते हैं तो कोई पर्वत यात्रा शुरू कर देते हैं। पर्वत की प्राकृतिक सुंदरता सहज ही लोगों को अपनी और आकर्षित कर लेती है। मुख्य रूप से 15 जनवरी को भारी भीड़ उमड़ती है, झारखंड में यह मेला ‘खिचड़ी मेला‘ के नाम से भी जाना जाता है।

झारखंडी संस्कृति की झलक है यह मेला: आचार्य
मधुबन में आयोजित होने वाले मकर संक्राति मेला में हमे झारखंडी संस्कृति की झलक मिल जाती है। अलग अलग समुदाय से लोग प्रकृति की सुंदरता को निहारने यहां पहुंचते है। यहां पहुंचते ही सभी एक रंग में रंग जाते हैं। संका्रति एक नियमित रूप से होने वाली खगोलीय घटना है। यू ंतो एक वर्श में 12 संका्रंति होती है यानि हर महीने संक्राति होती है पर मकर संका्रंति का अलग महत्व है। झारखंड का मुख्य फसल धान है और इस समय लोग अपनी फसलों को घर लाकर कृषि कार्यों से निवृत हो जाते हैं। उक्त बातें मधुबन में रह रहे आचार्य सुयश सूरी जी महाराज ने कही। मैनंे आचार्य श्री से इसलिए उनका विचार लिया क्योंकि इनका जन्म बोकारो जिला के पर्वतपुर में हुआ है। इन्होंने जैन दर्शन, संस्कृत व ज्योतिष का गहन अध्ययन करने के साथ -साथ झारखंड का भ्रमण करते हुए यहां होने वाले विभिन्न आयोजनों को काफी करीब से समझने की कोशिश की है। मधुबन मकर संका्रति मेला को ले कहते हैं कि बदलते समय के साथ काफी सकारात्मक परिर्वतन हुआ है। 



Friday, December 21, 2018

15 जनवरी 2019 से शुरू होगा प्रयाग अर्धकुम्भ


           तदर्धे वर्षमाने च कुम्भोर्धं सार्धपंचकम्।

           अर्धकुम्भं विजानीयात् फलार्धं मोक्षदायकम्।।

कुम्भ पर्व का आयोजन प्राचीन काल से ही होता रहा है और सनातन धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है। हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन एवं नासिक इन चार क्षेत्रों में क्रम से प्रत्येक बारह वर्षों के अंतराल पर पूर्ण कुम्भ पर्व का आयोजन होता है। लेकिन हरिद्वार तथा प्रयाग में हर छठवें वर्ष अर्धकुम्भ का भी आयोजन होता है। इस बार यानि जनवरी 2019 में अर्धकुम्भ मेला का आयोजन प्रयाग में किया जाएगा जिसकी तैयारी अंतिम चरण में है। राज्य सरकार भी मेला को ले पूरी तरह से तैयार है। बताया जाता है कि मेला का आयोजन 15 जनवरी 2019 से शुरू होगा जो 31 मार्च तक चलेगा। प्रयाग में कुंभ पर्व के तीन प्रमुख स्नान होते हैं जिन्हें शाही स्नान भी कहा जाता है। ऐसे में मकर संक्राति, दिनांक 15.01.2019 को प्रथम स्नान, माघ अमावस्या (सोमवती अमावस्या), 04.02.2019 को द्वितीय स्नान एवं माध शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी), 10.02.2019 को तृतिय स्नान होगा। इसके अलावा भी तीन और विषेश स्नान हैं जो पौष पूर्णिमा - 21.01.2019, माघी पूर्णिमा - 19.02.2019 एवं महाशिवरात्रि - 04.03.2019 को होगा। इस मेला में गंगा स्नान का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि स्नान से समस्त पापों का नाश होता है तथा जन्म - मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।

कुंभ का अर्थ

आस्था एवं विश्वास पर टीकी कुंभ की परंपरा सदियों से निर्वाध गति से चल रही है। कुंभ का शाब्दिक अर्थ कलश होता है। बताया जाता है कि देवासुर संग्राम के बाद जब देव व दानव पक्ष समुद्र मंथन को राजी हुए तो मंथन के क्रम में चैदह रत्नों की प्राप्ती हुई और उसे बांट भी लिया गया। लेकिन अमृत कलश के निकलते ही दोनों पक्षों में अमृत बंटवारे को ले युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गयी। तब भगवान बिष्णु ने स्वयं मोहिनी रूप धारण कर सभी को अमृत पान कराने की बात कही और अमृत कलश का दायित्व इंद्र पुत्र जयंत को सौंपा। उक्त कलश की रक्षा के लिए जब जयंत भाग रहे थे तभी अमृत की कुछ बूंदे पृथ्वी की चार जगहों पर यानि हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन एवं नासिक में गिरी। ज्योतिषिय दृश्टिकोण से बृहस्पति के मेष राशि चक्र में प्रविष्ट होने तथा सूर्य और चंद्र के मकर राशि में आने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में त्रिवेणी संगम तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

कई मामलों में विशेष होगा इस बार का कुंभ

       इधर कुंभ मेला को यादगार बनाने के लिए यूपी सरकार ने भी पूरी ताकत झोंक दी है। जहां विभिन्न स्थलों को सजाया संवारा गया है वहीं सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम होंगे। इधर मुख्मंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा कि है कि पहली बार ऐसी व्यवस्था की गयी है जिससे कुंभ में जल, थल एवं नभ मार्ग से श्रद्धालु पहुंचेंगे। यही नहीं पहली बार अक्षयवट और सरस्वती कूप का भी दर्शन कर पाऐंगे। प्रकाश की सारी व्यवस्था एलइडी द्वारा की जाएगी। टैण्ट सिटि, पेण्ट माई सिटि, अक्षयवट दर्शन, संस्कृति ग्राम आदि नई पहल की गयी है। लेजर शो और डिजिटल साइनेज की भी व्यवस्थाएं हैं। कुंभ क्षेत्र का विस्तार 3200 हैक्टेयर तक में किया गया है। 

कैसे पहुंचे

रेल - प्रयागराज की गिनती भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में होती है। यह रेलवे से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
वायुयान - प्रयागराज एयरपोर्ट बमरौली शहर से महज 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
सड़क - वहीं सड़क मार्ग की बात करें तो राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्ग से पूरी तरह जुड़ा हुआ है।


-इस ब्लाग में नियमित रूप से आते रहें। अर्धकुम्भ से जुड़ी हर गतिविधियों की जानकारी आप तक पहुंचाउंगा साथ ही साथ कुंभ मेला के दौरान यात्रा वृतांत भी साझा करूंगा।

Saturday, December 15, 2018

पिकनिक स्थलों में शुरू हुआ सैलानियों का आगमन

खंडोली में बनी मूर्ति को देखता एक बच्चा
दिसंबर का दूसरा पखवारा शुरू होते ही विभिन्न पिकनिक स्थलों में सैलानियों की चहलकदमी तेज हो गयी है। झारखंड राज्य स्थित गिरिडीह के खंडौली डैम व उसरी फाल में पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगी है। दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह से लेकर जनवरी के प्रथम सप्ताह के बीच इन स्थलों में भारी भीड़ होती है। एक जनवरी को भी इस ब्लाग में इन जगहों की तस्वीर साझा करूंगा।
   बता दूं कि गिरिडीह जिला मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर खंडोली डैम स्थित है।  इस डैम में लोग नौका विहार का आनंद उठाने यहां पहुंचते है। साथ ही साथ यहां का प्राकृतिक नजारा भी लोगों का अपनी और आकर्षित करता है। यहां बनाया गया उद्यान भी देखने लायक है। मोर, खरगोश जैसे छोटे -छोटे जानवर, झूला आदि बच्चों को ज्यादा आकर्षित करते हैं। वहीं प्रवासी पक्षियों का कलरव भी मन को सुकून पहुंचाता है। कई लाोग काफी देर तक किनारे बैठकर पक्षियों को जल में अठखेलियां करते देखते हैं। वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर उसरी फाल है। इस झरना को देखने भी भारी संख्या में लोग पहुंचते है। खासकर नववर्ष का स्वागत करने के क्रम में यहां आना नहीं भूलते। पानी की कल कल करती ध्वनि के बीच कुछ लोग केवल प्रकृति की सुंदरता का लाभ उठाते हैं तो कुछ वनभोज का भी आनंद लेते है। फिलहाल इन दो जगहों में सैलानियों का आगमन शुरू हो गया है।


Friday, December 14, 2018

ऐसे करें यात्रा की तैयारी

लगभग 15 दिनों पहले मुझे जम्मू जाना था। ट्रेन लेट होने के कारण लगभग 6 घंटे की यात्रा के बाद हावड़ा स्टेशन से बाहर निकलते ही मैनें अपने मोबाइल से केब बूक करना चाहा तो मेरे मोबाइल की बैट्री मात्र 20 प्रतिशत चार्ज थी। बैग व पाॅकेट चेक करने के बाद पता चला कि चार्जर लेना ही भूल गया। डब्ल्यूबीटीसी की बस से एयरपोर्ट पहुंच गया। मेरे पास प्रिंट टिकट नहीं था और अगर मेरा मोबाइल बंद हो जाता तो एयरपोर्ट प्रवेश करने के लिए टिकट भी नहीं दिखा पाता। ऐसे में सुबह चार बजे की फ्लाइट थी और मैं रात दस बजे ही एयरापोर्ट के अंदर चला गया। अंदर जाकर जब अपना मोबाइल चार्ज किया और समय काटने के लिए जब इयरफोन निकाना चाहा तभी देखता हूं कि अपना इयरफोन भी घर में ही छोड़ आया हूं। ऐसा नहीं है कि आप बाहर ये सब चीजें नहीं खरीद सकते हैं, पर मेरे कहने का मतलब है कि छोटी छौटी चीजे भी हमें बड़ी परेशानी से बचाती है। इन चीजों की कमी से आप झल्लाहट महसूस करने लगेंगे। बहुत पहले से ही कहीं जाने की योजना बन रही हो तो यात्रा की तैयारी में कमी रह जाने की संभावना बहुत कम होती है। फिर भी नयी जगह जाने का अतिउत्साह व कौतुहल से कभी- कभी बहुत सी महत्वपूर्ण चीजें छूट जाती है, उस समय अफसोस करने के अलावा कोई विकलप नहीं बच जाता है। यात्रा की तैयारी अच्छी हो तभी यात्रा का सही आनंद भी मिलता है। इस पोस्ट में कुछ बिंदुओं का जिक्र किया है जिसे यात्रा पर जाने से पहले एकबार जरूर चेक कर लें।

यात्रा सामग्रियों की सूची बनायें - कहीं भी जाना हो पहले यात्रा पर जाने से पहले वहां ले जाने वाले सामानों की सूची जरूर बना लें। कपड़े, साबून, तेल, कंघा, मोबाइल हेडफोन चार्जर, घड़ी, दवा, डेबिट के्रडिट कार्ड, कैमरा आदि ऐसी चीजें हैं जो हर यात्रा में आवष्यक है। हो सके तो पहले ही सूची बना लें और घर से निकलते समय मिलान कर लें। भले ही आप ट्रेन, फ्लाइट, होटल आदि का आनलाइन टिकट बनाये हो पर उसकी हार्डकापी अपने पास जरूर रख लें। जब भी मैं इस तरह की सूची बना कर कहीं जाता हॅू कभी किसी तरह की परेशानी नहीं होती है।

स्थल की पूरी जानकारी ले लें - आप चाहे तीर्थस्थल की यात्रा पर जा रहे हैं या फिर पर्यटन स्थल की। जाने से पहले उस स्थल की जहां तक संभव हो बुनियादी जानकारी ले लें। स्थल पहुंचकर भी सोचसमझकर ही किसी से जानकारी या सहायता मांगे। बेहतर होगा किसी सरकारी या ट्रस्ट के काउंटर या पूछताछ कार्यालय से जानकारी लेना।

अकेले न जाएं - नयी जगह पर कभी भी अकेले न जाएं। समूह में यात्रा करने से किसी भी आपात स्थिति से आसानी से निबटा जा सकता है।

तीर्थयात्रा के नियमों का पालन -  अगर आप कोई प्रसिद्व तीर्थ स्थल यानि तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं तो वहां के नियमों को भली भांति समझे तथा उसका पालन करें। तीर्थस्थलों में खास कर शुद्धता पर घ्यान दिया जाता है। खान पान तथा वहां की परंपरा व नियमों के पालन करें। ताकि किसी पूजा व विधान में शामिल होने से वंचति न रह सकें।

Friday, December 7, 2018

रॅाक गार्डेन : भारत का एक अनोखा उद्यान

रॅाक गार्डेन के अंदर का नजारा
आमतौर पर गार्डेन यानि उद्यान का नाम आते ही जेहन में एक ऐसा स्थल आता है जहां चारो और रंगबिरंगे फूल हो। किस्म के किस्म के फूलों पर मंडराते भंवरे, चहचहाती चिडियां तथा सुगंधित वातावरण, ऐसा नजार एक गार्डेन में दिखना आम है। पर आज मैं जिस गार्डेन में आपको लेकर जा रहा हूं वहां फूल नहीं बल्कि पत्थर मिलेंगे। लेकिन इन बेकार पत्थरों को भी इस तरह का रूप दिया गया है जो फूल से कम आकर्षक नहीं लगते। जी हां, मैं बात कर रहा हूं पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ स्थित राक गार्डेन की। चालीस एकड़ में फैले इस गार्डेन को नेक चंद सैनी गार्डेन के नाम से भी जाना जाता है। इस गार्डेन का निर्माण उन्होंने ही किया था।
                                       
फ्लाइट से दिखता शहर का दृश्य
                                 

        चंडीगढ़ एयरपोर्ट में लैंडिंग का समय सुबह सात बजे का था।फ्लाइट से ही शहर का  नजारा देखते ही आपको इस बात का आभास होने लगता है कि आप उस षहर की यात्रा करने वाले है जो काफी व्यवस्थित है। षहर की पूरी संरचना पूर्व नियोजित है तथा अलग अलग सेक्टर में बंटा है। एयरपोर्ट से बाहर निकने के बाद सेक्टर 21 स्थित एक होटल में पहुंचा जहां मुझे यह बताया गया कि यू ंतो चंडीगढ़ में देखने के लिए कई जगह है पर मुझे राक गार्डन अवष्य ही देखना चाहिए। लगभग ग्यारह बजे मैं राक गार्डेन पहुंचा। टिकट काउंटर पर भीड़ नहीं थी।

झरना का दृश्य



 गार्डेन में प्रवेष करते ही पुराने पत्थरों की कई आकृतियां मिली। कुछ कदम आगे बढता गया और ऐसे ही पत्थरों की आकृतियां मिलती गयी। कम भीड़,प्रवेश स्थल पर सन्नाट, साधारण से लग रही पुराने पत्थरों की आकृतियां देख मन में पश्चाताप का भाव आने लगा। आखिर क्यों आ गया यहां, केवल समय बर्बाद करने। फिर सोचा जब अंदर आ ही गया हूं तो पूरा घूम लेता हूं।
एक और झरना का दृश्य

आगे एक गली मिली, गली से आगे बढ़ते ही पानी गिरने की आवाज सुनाई दी। जैसे जैसे आगे बढ़ता गया पत्थरों व अन्य बेकार की वस्तुओं से बनी कलाकृतियां साधारण से असाधारण होती गयी।
       आगे बढ़ते ही वाकई मुझे एक उद्यान का वातावरण मिलने लगा। चारो तरफ पेड़- पौधे, पहाड़ी की आकृति लिए पत्थरों का ढेर। अब मेरे में मन में भी इस स्थल को लेकर विचार बदलने लग गए थे। बाद में पर्यटकों का समूह भी दिखने लगा। कुछ यहां की कलाकृतियां व प्राकृतिक नजारों को निहार रहे थे तो कुछ सेल्फी लेने में मशगूल थे। कई जगइ सीढी़नुमा ऐसे जगह बनाए गए थे जहां से इस उद्यान की सुंदरता को देखा जा सकता है। आगे बढ़ते ही एक कृत्रिम झरना मिला जहां काफी उंचाई से दीवारों के सहारे पानी नीचे गिरता है। यहंा आकर कोई भी अपना फोटो लेना नहीं भूलता यही वजह था कि फोटो लेने वालों की यहां काफी भीड़ थी।

                                         
अंदर बनी मूर्तियां

   आगे बढ़ते - बढ़ते एक खुली जगह पर पर पहुंच गया मानो बड़ा मैदान हो। यहां बैठने की भी जगह थी। वहीं बगल में अलग - अलग कक्ष थे जहां तरह - तरह की चीजें थी। कुछ ऐसे दर्पण थे जिसमें आपका चेहरा विकृत दिखाई देता है। किसी दर्पण में एक व्यक्ति मोटा दिखाई देता है तो किसी एक में बौना। वहीं सामने क्रम से झूले लगे थे जिसमें कई लोग झूला का भी आनंद ले रहे थे। यहीं पर एक ऐसा कक्ष भी था जहां कपड़ा आदि से मूर्तियां बनायी गयी है जो ग्रामीण परिवेष को दर्षा रहा है। वहीं इस राक गार्डेन से जुड़ी जानकारियां भी है। यह पार्क सुखना झील के निकट स्थित है।
                                     

यहां की प्राकृतिक वातारण तो आपको आकर्शित करता ही है पर कूड़ा - कर्कट, जैसे प्लास्टि की बोतले, पुरानी चूडियां, टूटे कप -प्लेट, टाइल्स आदि  चीजों से इतनी खूबसूरती से आकृतियां बनायी गयी है कि आपकी नजरे हटती नहीं है। ये सब देखने के बाद लगता है कि अगर आप कभी चंडीगढ़ आते हैं तो इसे देखना न भूलें।

कैसे पहुंचे -
चंडीगढ़ में अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट है साथ ही साथ यहां रेलवे स्टेशन भी है जो देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है।
   

Sunday, November 25, 2018

यात्रा जगन्नाथ पुरी की


जगन्नाथ मंदिर
जय जगन्नाथ !
आज मैं जगन्नाथ धाम पुरी की यात्रा का वृतान्त साझा कर रहा हूं। चार धामों में इस एक धाम का वर्णन करना आसान नहीं है, बस यहां आकर इसे अनुभव किया जा सकता है। यह स्थल जगन्नाथ यानि श्री कृष्ण को समर्पित है। यहां श्री कृष्ण अपने भाई बलराम व बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।
      स्टेशन से बाहर निकलते ही मन में भक्ति की लहर उठने लगती है। सबसे पहले मैनें एक आटो बूक किया तथा होटल गया। लगभग दो माह पहले ही मैनें एक होटल में रूम बूक कर रखा था। होटल ठीक समुद्र के तट पर ही स्थित था। होटल की संरचना भी कुछ ऐसी थी कि आप बालकनी से समुद्र के मनोरम दृष्य का आनंद ले सकें। होटल वालों से जानकारी मिली पूजा पाठ के लिहाज से अगर आप सुबह आठ- नौ बजे मंदिर पहुंचते हैं तो बेहतर होगा। सुबह आठ स्नान आदि कर होटल से बाहर निकल गया तथा एक आटो वाले ने मंदिर से लगभग 200 मीटर पहले उतार दिया। वाहनांे को मंदिर  के प्रवेश द्वार तक जाने की अनुमति नहीं है।
     जगन्नाथ मंदिर इतना भव्य है कि दूर से ही दृष्टिगोचर होने लगता है। इस मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र है, इस चक्र की विषेशता यह कि आप जहां कहीं से भी इस चक्र को देखेंगे आपको लगेगा यह आपकी तरफ ही मुड़ा है। शिखर पर लगा चक्र व पताका को देखते हुए हमलोग मंदिर की ओर चल दिए। प्रवेश मंडप पर साफ साफ कई निर्देश लगे हुए थे। वहीं समीप ही जूता स्टैंड था जहां हमलोगों ने अपने अपने जूता, चप्पल, बेल्ट, कैमरा, मोबाइल आदि जमा करा दिया। उसके बाद कतार में लग गए। हमलोगों से पहले भी कई लोग कतार में लगे हुए थे। धीरे धीरे कतार आगे बढ़ रही थी, अंततः हमलोगों का भी नंबर आया और हम प्रथम द्वार प्रवेश कर गए। आगे सिढ़ियां थी, बताया गया कि इसमे 22 सिढ़ियां हैं। यहां कुछ लोग फूल व फूलमाला बेच रहे थे। बेचने का तरीका ऐसा कि हर हाल में आपके हाथ में थमा कर ही दम लें। हलांकि मैनें नहीं लिया, क्योंकि मैं पहली बार यह मंदिर प्रवेश कर रहा था तथा इस बात से अनजान था कि फूल व फूलमाला जगन्नाथ प्रभु को समर्पित करने का मौका मिलेगा भी या नहीं। हलांकि बाद में इस बात का अहसास हो गया कि मेरा निर्णय सही था।
      प्रसाद खरीदा और दर्शन करने को आगे बढ़ा। यहां के पुजारी यानि पंडा मिल गये जो भगवान का दर्शन आराम से करवा देने का दावा कर रहे थे। मंदिर प्रवेश करते ही इस तरह के कई पंडा आपको मिलेेंगे बेहतर होगा। इन्हें पर ज्यादा ध्यान नहीं देना ही बेहतर है।  मन ही मन भगवान  जगन्नाथ का स्मरण करें। सबसे पहले प्रसाद खरीद लें। प्रसाद  के लिए सरकारी काउंटर बना हुआ है जहां सरकारी दर पर प्रसाद उपलब्ध है। अंदर गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा व बडे़ भाई  बलराम की प्रतिमा है। दर्शन के लिए अनियंत्रित भीड़ थी।  भीड़ देखकर ही मन में अजीब सा उहापोह था। प्रभु का स्मरण करते हुए आगे सरक रहा था। भगवान की अद्भुत कृपा थी कि इस भारी भीड़ में भी दर्शन हो गया। प्रतिमा दर्शन के दौरान मेरी मनः स्थिति क्या थी इसका वर्णन नहीं कर सकता। ऐसा लग रहा था मानो साक्षात भगवान आर्शीवाद बरसा रहे हो। हर्ष से गला रूंध गया था, आवाज नहीं निकल रही थी और आंखों से आंसू गए थे।  किसी बड़ी शक्ति की उपस्थिति का अहसास होने लगा था। यहां आकर प्रभु का स्मरण करते हुए यहां के अलौकिक वातावरण को महसूस करें।

दूर से दिखाई देता मंदिर  


     मुख्य मंदिर से बाहर निकलकर आंगन मे आ गया जहां छोटे छोटे मंदिरों का समूह था। अलग अलग देवताओं के क्रम से मंदिर थे। काफी देर तक मंदिरों की संरचना को निहारता रहा। इस मंदिर में चार मंडप है। पहला भोग मंडप - भोग लगाने के लिए, दूसरा रंग मंडप - भजन आदि के  लिए, तीसरा सभा मंडप- दर्शनार्थियों व भक्तों के लिए तथा एक जिसमें  प्रतिमाएं स्थापित हैं। ये सब जानकारी मैनंे वहां के जानकारों व पंडा से बातचीत के क्रम में बताया। उन्होंने जैसे बताया वैसे ही लिख रहा हूं। 
     पुरी का मुख्य आकर्शण जगन्नाथ मंदिर ही है। यहां का वार्शिक उत्सव रथयात्रा है जिसमें भाग लेने देश - विदेश से भारी संख्या में भक्तगण पहुंचते हैं। इस उत्सव में श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा की पूजा - अर्चना करते हैं।

नोट - चूंकि मंदिर में कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं थी इसलिए इस पोस्ट में लगी पहली तस्वीर मैनें गूगल सर्च से डाउनलोड किया है।